Tuesday, 4 April 2017

मैं नदी हूँ ...

दुनिया की तमाम अच्छी बुरी चीजें समेटते हुए हज़ारों सालों से , हज़ारों मील से बहती आ रही मैं , मैं नदी हूँ !

मैं भारतीय नदी हूँ ! भारतीय इसलिए कहा क्योंकि ये शब्द नाम के आगे लगते ही मैं उस संस्कृति की वाहक हो जाती हूँ जिसे आप हज़ारों साल पुरानी सभ्यता के प्रतीक के तौर पर इस्तेमाल करते आये हैं। ये शब्द लगाते ही मैं  इतनी सम्माननीय हो जाती हूँ कि आप मुझे कभी देवी तो कभी माँ के नाम से पुकारने लगते हैं ..

आपकी व्याकरण ,आपके वेद मुझे स्त्री स्वरूपा , स्त्रीलिंग के रूप देखते हैं। हाँ , मैं भारतीय नारी का पर्याय हूँ।

ये सच भी है , इस समाज और संस्कृति ने हमें जीवनदायिनी और पवित्र माना है पर विडम्बना देखिये आज हम दोनों ही अपनी दुर्दशा पर शर्मिंदा है कि हमने अपनी कोख से कैसी संस्कृति ,कैसे समाज को जन्म दे दिया ?

आप पहले हमारी पूजा करते हैं और फिर हमारा ही बलात्कार  करते हैं , हमारी शुचिता की बात करते हैं फिर हमें ही गन्दा करते हैं ! अजीब समाज है ये , हमें ख़ास होने का रुतबा और ऊपर का दर्जा देता है ..फिर भी हमें सुरक्षा नहीं दे पाता। हम खुद को बचाने के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं और वो सिर्फ धर्म और संस्कृति की आड़ में हमारा दोहन कर रहे हैं।

मैं किताबों में हूँ  ,अखबारों में हूँ ,भाषणों में हूँ, नारों में हूँ . और तो और मैं सरकारी योजनाओं में भी हूँ ! मेरे नाम पर गंगा एक्शन प्लान ,नमामि गंगे ,जननी सुरक्षा जैसी योजनाएं बना करोड़ों रुपए बहा दिए जाते हैं  ...फिर भी मैं साफ़ कहां हूँ ? मैं फिर भी मैली होती ही जा रही हूँ ! सियासत के शूद्र  मुझमें नाले खोल रहे हैं , मुझे नालियों में बहने के लिए मजबूर कर रहे हैं।

अब जब कोई अपने भाषण में, अपने नारों में मेरा नाम लेता है तो मेरा दिल चीख उठता है ! हमारे वजूद पर बुरी नज़र रखने वाले ये सेठ -साहूकार , नेता हमसे कमाते हैं और हमें ही खत्म करने में लगे हैं।  ये वही लोग हैं जो 'यत्र नार्यस्तु पूज्यते रमन्ते तत्र देवता' का पाठ करते हैं और हमारा ही शोषण कर देवता बन घूमते हैं ..
मेरे पास जुबान होती तो मैं चिल्ला के कहती कि हमें पूजने वाला समाज का ये तबका ही हमारा सबसे बड़ा बैरी है !

आप मुझे माँ कहते हो ? हां ! मैं कुंती हूँ , द्रौपदी हूँ, मैं तुलसी हूँ , मैं वही गौ माता हूँ जो सदियों से समाज की त्रासदी और राजनीति का शिकार रही..और आज सियासत की गद्दी का पायदान बनकर रह गई हूँ।

मुझे विवाद की जड़ भी बना दिया आप लोगों ने। आप किस अधिकार से मुझपर अपने अधिकार की लड़ाई लड़ रहे हैं ? लड़ते आप हो क्योंकि स्वार्थ आपका है लेकिन  इसका दोष भी मेरे ऊपर मढ़ देते हो  .. आपकी भी क्या गलती ,आपको सिखाया यही गया कि ज़र ,जोरू और ज़मीन झगड़ों की जड़ है पर क्या ये सच में झगड़ा करवाती हैं ?  नहीं , ये आपकी हमें भोग की वस्तु मानने की प्रवृति है जो आपको झगड़ों में उलझाती है।

एक समय था जब मृत्यु शैय्या पर मेरी एक बूँद विष्णु लोक की राह बन जाती थी , पर मेरी ही सन्तानों ने मुझे इतना गन्दा कर दिया गया कि मैं अमृत , अब विषपान से कम नहीं हूँ ..

हाल ही में एक उच्च न्यायालय ने मेरे अधिकारों कि बात करते हुए मुझे मानवीय अधिकार दे दिए ..पर मुझे कोई उम्मीद नहीं है ..जिस देश में मनुष्यों को, जो आवाज बुलंद कर सकते हैं ,लड़ सकते हैं,अपने अधिकारों के लिये, उनके ही अधिकार सुरक्षित नही हैं ..तो मुझ गूंगी बहरी नदी के अधिकारों की सुरक्षा कैसे हो पाएगी?

ना दें आप मुझे सुरक्षा ,कोई शिकायत भी नहीं ! मैं नहीं चाहती कोई अधिकार ..मैं नहीं चाहती मेरी पूजा हो .बस .मैं जीना चाहती हूँ ...मैं बहना चाहती हूँ ..इस छोर से उस छोर तक बिना रुके..
मुझे जीने दें ,सांस लेने दे , मेरी कोख की पवित्रता बनी रहने दें ताकि आने वाली नस्लें आप पर शर्मिंदा ना हों...