चौपाल ...
जो जी रहा हूं,लिखता हूं .....कुछ अपना कहा ,कुछ उनसे सुना !
Sunday, 8 August 2021
जीवन के दिन
Thursday, 10 June 2021
रघुपति सहाय
उसमें मेरे प्रिय हैं, मेरे हितैषी हैं, मेरे गुरुजन हैं
उसमें कोई मेरा अनन्यतम भी है
पर मेरा एक और जीवन है
जिसमें मैं अकेला हूँ
जिस नगर के गलियारों, फुटपाथ, मैदानों में घूमा हूँ
हँसा खेला हूँ
उसके अनेक हैं नागर, सेठ, म्युनिस्पलम कमिश्नर, नेता
और सैलानी, शतरंजबाज और आवारे
पर मैं इस हाहाहूती नगरी में अकेला हूँ।
देह पर जो लता सी लिपटी
आँखों में जिसनें कामना से निहारा
दुख में जो साथ आये
अपने वक्त पर जिन्होंने पुकारा
जिनके विश्वास पर वचन दिये, पालन किया
जिनका अंतरंग हो कर उनके किसी भी क्षण में मैं जिया
वे सब सुहृद है, सर्वत्र हैं, सर्वदा हैं
पर मैं अकेला हूँ।
सारे संसार में फैल जायेगा एक दिन मेरा संसार
सभी मुझे करेंगे-दो चार को छोड़-कभी न कभी प्यार
मेरे सृजन, कर्म-कर्तव्य, मेरे आश्वासन, मेरी स्थापनायें
और मेरे उपार्जन, दान-व्यय, मेरे उधार
एक दिन मेरे जीवन को छा लेंगे- ये मेरे महत्व।
डूब जायेगा तंत्रीनाद कवित्त रस में, राग में रंग में
मेरा यह ममत्व
जिससे मैं जीवित हूँ।
मुझ परितप्त को तब आ कर वरेगी मृत्यु - मैं प्रतिकृत हूँ।
पर मैं फिर भी जियुँगा
इसी नगरी में रहूँगा
रूखी रोटी खाउँगा और ठंड़ा पानी पियूँगा
क्योंकि मेरा एक और जीवन है और उसमें मैं अकेला हूँ।
Sunday, 14 March 2021
कुँवर नारायण
Sunday, 7 October 2018
जवाब में मुझे खत लिखना
जिंदगी कितनी बार अचंभित करती है, खुद से खुद को अजनबी कर देती है और कभी खुद से ही ऐसे परिचय करवाती है जैसे बरसों पहले बिछड़ा कोई यार मिला हो !!
कई सवाल हैं और हर सवाल के कई जवाब ! जब मैं सवाल लेता हूँ तो जिंदगी के जवाब मुझे और सवाल दे जाते हैं और जब जिंदगी को जवाब देने की जुर्रत करता हूँ तो लगता है , ये हौसला कहाँ से आया मुझमें, कौन है मुझमें जो मुझसे ये सब करवा रहा है ?
मैं खुद में किरदार हूं और अपनी ही लिखी पटकथा को निभाता और उसकी आलोचना करता हूँ | अपने अभिनय पर खुद की ही पीठ थपथपाता हूँ ,कभी अपने ही किरदार पर लानतें बरसाता हूं !!!
ऐसा अक्सर होता है , एक क्षण लगने लगता है कि मैं बदल गया हूँ लेकिन अगले ही पल खुद उसी प्रतिक्रिया को जी रहा होता हूँ , जो मैं सोच रहा था कि अब वैसा कुछ नहीं होगा !! अजीब विरोधाभास है ! कभी लगता है कितना कुछ पीछे छोड़ आया हूँ , कितना कुछ बदला है आसपास ...........
पर ये सब कमरा बदलने जैसा है ! कमरा नया होता है ना ,पेंट पॉलिश.......सब नया लेकिन सामान तो सब नया नहीं होता और नया मैं भी कहां होता हूँ ? वैसा का वैसा सामान के साथ जैसे खुद को ला पटका हो ....... पर ये भी सच नहीं है , बदला मैं भी हूँ ! पहले जब खिड़की पार्क में खुलती थी तो मैं नीम और पीपल से बतियाता था और अब कंक्रीट की मीनार के सामने खड़ा पाता हूँ तो जैसे छैनी -हथौड़ी लिए बालकनी में खड़ा खुद को आज़माता हूँ ,सपनों को गढ़ता हूँ !! हाँ , बदला तो हूं !!
अपने भीतर की सम्भावनाओं को मैं सिरे से खारिज नहीं कर पाता और कभी खुद को ये यकीन नहीं दिला पाता कि वो मैं ही हूँ जो सम्भावनाओं को बना कर आया हूं !! एक अंतरिक्ष था मेरे भीतर ,जिसमें काला धुंआ था और उसमें बंद अनिश्चितता ,अनमनेपन की राख थी.......मैं वो छोड़ आया हूँ ! अब अनमनापन भी नहीं और अनिश्चितता भी नहीं लेकिन अब एक अजीब सी हड़बड़ी है जो सब कुछ जल्दी से ठीकठाक कर देना चाहती है |
ठीक क्या करना है ? खुद से सवाल करता हूँ !!
वही जो ठीक नहीं है !!
ठीक नहीं है यानी तुम खुश नहीं हो ?
किसने कहा कि खुश नहीं ? ये मेरे लिए सबसे बेहतरीन समय है , मैं खुद को जी पा रहा हूँ ,खुद के साथ समय बिता पा रहा हूँ !!
तो इतने उद्वेलित क्यों हो ?
मन कहता है ,सब ठीक है पर लगता है ये दुनिया के पैमाने पर सही नहीं है !!
तो तुम दुनिया की सोच रहे हो ?
शायद हाँ !!
हाँ ही है !! हम सब दुनिया के लिए ही पैदा हुए हैं और दुनिया के लिए मर जाते हैं , हमें यही सिखाया गया है ! ऐसे बोलें ,क्या बोलें,क्या करें ,क्या ना करें ,कब कैसे और कहाँ जाना है !! सब दुनिया ही बता रही है ....... तुम खुद से कब मिले थे , खुद को क्या कहा था ,खुद की कब मानी थी , तुम्हें याद भी नहीं होगा ......!!
सच में !! यही हुआ भी है ... अपने सवालों के जवाब में कितना भटक लिया और जवाब मुझे सवाल बन के मिले हैं ! मेरे भीतर अंतर्द्वंदों का जो अंतरिक्ष है ना, उसमें आकाश गंगा हूँ........ अरबों खरबों चाँद सितारे लिए जाने क्यों.... खुद को दूधिया नदी नहीं महसूस पाता और कभी जब उससे बतियाता हूँ तो उजली भोर बन जाता हूँ ,जो अपने साथ उजालों का एक पूरा संसार ले आती है...... मैं इसी पते पर रहना चाहता हूँ ,मेरी जिंदगी तुम मुझे चाँद -सितारों , उजालों का संसार देना , जवाब में मुझे खत लिखना और खत पर जिंदगी लिखना !!!
Thursday, 4 October 2018
ट्विटर से गिरे , खजूर पे अटके
अपने ब्लॉग में आयी आपकी प्रतिक्रियाओं ने मुझे विश्वास दिलाया है कि मैं ट्विटर को वही समझा हूँ जो आप भी समझ रहे हैं लेकिन कह नहीं रहे हैं ! जो कह रहे हैं , सोच के कह रहे हैं कि ये ना लगे कि मैं सही समझ गया और आप समझते हुए पकड़े गए।
ट्विटरिया इश्क़ के इस जंगल राज में कई किले हैं ,भूलभुलैयां हैं , गाँव ऐसे भी है जो बसे नहीं , मल्टीस्टोरी भी हैं और कहीं एक स्टोरी भी नहीं !! चाँद की तस्वीरें और उसके शुक्रिया के इंतज़ार में कुछ की स्टोरी फुटपाथ पर ही बीती जा रही है |
यही खेल चलता है यहाँ !! वो किस को कह रही है या उसने वैसा किस के लिए कहा ,इसको डीकोड करने में पूरा पूरा दिन लग जाता है और कई बार यहां के अड्डेबाज़ पूरी पूरी रात भी इस रहस्य पर से पर्दा उठाने में नाकाम हो जाते हैं !! कयास लगाए जाते हैं ,संभावनाएं व्यक्त की जाती हैं और संकेतों ही संकेतों में पुराने नज़दीकी खातेदारों के इर्दगिर्द शक की सुइयां घूमने लगती हैं। भीतर का करमचंद जासूस ये जानने के लिए मचल जाता है आखिर प्रेम में पगे ये आखर किस जोगी को अपने दरवाजे खींच लाने के लिए लिखे गए हैं !!
वो कहता है तुम्हारा आँचल आसमान है,तो वो परिंदे की तरह टूट के उसके इश्क़ में समा जाना चाहती है ! वो तो बस नहीं चलता वरना दोनों के खाते भी एक ही छत के नीचे बन जाये और छत पर चढ़कर दोनों कॉफी के प्यालों को टकराते हुए अपने इश्क का ऐलान कर दें ........ कुछ कर भी देते हैं ! उनके ऐलान ए इश्क के साथ TL उनके दिल ,फूल और #तुम #हाँ_तुम #इश्क़ जैसे हैश हैंगरों पर टंग जाती है |
जो बेचारे कुछ कर नहीं सकते,इस सबको देख के खून का RT और फेवरेट करते हैं ! बोलते वाह्ह हैं पर असल में दिल से निकलती आह्ह है !! अरमान हैं , सबके मचलते हैं | किसी का झुमका ,किसी की बिंदी ,किसी की लल्लनटाप आँखे और किसी की दिल्ली की सड़कों जैसी जुल्फें ..........
रहम किसी गली में नहीं और चैन किसी जगह नहीं !!! नहीं देखा जाता ,नहीं संभाला जाता किसी का किसी से इस कदर इश्क़ तो उसे म्यूट कर दिया जाता है। कुछ दिन चैन रहता है लेकिन DM फिर भी पूछ लेता है ,ब्रेकअप हुआ कि नहीं !! मतलब पूछता ऐसे है कि जैसे वही वेटिंग में अगला नंबर उसी का ही है।
जानकारी मिली कि मामला ठंडा चल रहा है ,आजकल उसके ट्वीट RT नहीं करता और वो उसके कॉन्वो में भी नहीं आती ! व्हाट्सप्प टनटना जाता है या DM मचलता है " तुम ठीक हो ना " ....... दो ऑप्शन है ,या तो इग्नोर या तो फिर हवा दे दो !! अब कितना झूठ बोलने सुनने के बाद भगवान उठाएगा इनको, इसका हिसाब तो चित्रगुप्त जी को उनका डेटा दे ही देगा।
अजीब दुनिया है !! दाल कुकर में फुफकारें मारती पूरा चौका भर देती है लेकिन मन में इश्क और उसका स्टेटस हिलोरें मार रहा होता है और एक रोज जब सारी दुनिया सो रही होती है ,दोनों ढूंढ ढूंढ के अपने प्रेमालाप ऐसे डिलीट कर रहे होते हैं जैसे दिवाली की सफाई आज ही करनी है ताकि उस कबाड़ को बेच कल घी के दिए जलाये जा सकें ! महीने -चार महीने की चांदनी अंधेरी रात में बदल जाती है | मुंगेरी के हसीन सपनों से सजीधजी रातें प्रेम में इंतज़ार को श्राप बताने लगती हैं !!
सब मोहमाया है प्यारे पर इधर ना माया छूटती है ना शीला आती है !! जी करता है जोर से चिल्ला के कहूँ .........मोह छोड़ दो हवाबाजों , अज्ञात कुछ भी नहीं है और ज्ञात का अभिमान चूल्हे की राख है।
यहाँ सिर पर नाच रही कवितायें रावण की जिद के आगे फेल हो जाती हैं। वैसे तो मोहल्ले के बड़े बुजुर्गों की सलाहियतों की दूकान का हिसाब ब्रह्मा के मुंशी भी नहीं रख सकते लेकिन यहाँ कुछ हैं जो खुद को ट्विटर का म्युन्सिपल इंस्पेक्टर समझ के जब तब चालान बनाने लगते हैं। ये कुटनियों के उस किरदार में हैं जो खाते खाते चक्कर लगा कर पान में कत्था -चूना मल देती हैं।
तो साहब, इश्क़ में ना तो कोई उम्र भर शमा के जला के बैठा है ना किसी की सलाइयों से स्वेटर के उतरने के इंतज़ार में दांत किटकिटा रहा है ! ये ट्विटर लोक है , यहाँ अतृप्त आत्माओं और शायर यारों का दबदबा है। इधर आना तो हथेली पर दिल लेकर आना और जाओ तो सारे दिलों को डिलीट करके जाना ताकि मैमोरी पर जोर ना पड़े और आप खुद को , हैंडल नहीं इंसान महसूस कर सको !! असली दिल इमोजी नहीं है , दिल इश्तिहार भी नहीं जो गली गली चिपकाया जा सके।
आईये इधर और गुजर जाईये...... रहने के लिए हैंडल नहीं घर चाहिए ,जीने के लिए इस खाते की नहीं उस खाते की जरूरत है ,जिसमें अपनों के सपने पलते हैं तो रुकने का नहीं इधर , ज्यादा सोचने का भी नहीं ! चलते रहिये !!
Tuesday, 2 October 2018
ट्विटर प्रेम ..कथा अनंता
ये ट्विटर की गलियाँ बड़ी रूमानी हैं !! फेसबुक वाले इश्क करना नहीं जानते ऐसा नहीं है लेकिन ट्विटर का संसार इश्क में सम्भावनाओं को अनंत विस्तार दे देता है।आप कब एक गली से गुजरते हुए किसी दूसरे की प्रेम कथा में किरदार बन जाते हो पता ही नहीं चलता....... सामने वाला कब आपसे मोहब्बत करने लगे ये भी नही पता चलता और ये भी कि कब वो रूठ के दूसरी गली में पहुंच गया या अपना खाता ही बंद करके दूसरे खाते से आपका हिसाब लेने लगा है...... !!
सब कुछ बड़ी तेजी से और बड़े ही दिलचस्प अंदाज़ में घटता है। नायिका के नखरे और नायक का टशन...... थोड़ी स्लाई,थोड़ी मलाई , जरा सा जैम ,जरा सा रायता !! कहानी आगे बढती है तो टीएल पर दिल तैरने लगता है !! आँखों से उतरते हुए गालों पर चिपका दिल और बिना टैग किये चल रही गुफ्तुगू रेडियो FM की फील देने लगती है। इधर एक प्रेम कथा अवतरित होने लगती है ,उधर मोहल्ले के सारे भूतपूर्व या भावी दावेदारों के DM खनखनाने लगते हैं ! कुछ चचा -बाबा ,मौसियाँ और आंटियां भी चौराहे पर कनफुसियाने लगती हैं।
जिनसे दूसरों का सुख देखा नहीं जाता वे उनकी उम्र , शादी शुदा होने के लक्षण टटोलने लगती हैं !! लड़के या लड़की के उसकी पुराने प्रेम से हुए प्रेमालाप को सीसी करते हुए ,RT और फेवरेट एजेंसियों के माध्यम से नव अंकुरित प्रेमांगन में बो दिया जाता है।
ज्ञान बंटने लगता है , नैतिक शिक्षा और संस्कारों की क्लास शुरू हो जाती है। परिवार के बड़े बूढ़े जम जाते हैं ,ये समझाने के लिए कि तुम जो कर रहे हो उससे भारतीय संस्कृति नष्ट हो जायेगी, तो करना है तो ऐसे करो कि संस्कृति की चिड़िया भी दाना खाती रहे और कोई बालक -बालिका निराश भी ना रहे।
लोगों की हाय लग जाती है !! धीरे धीरे TL पर तलाक की नौबत आ जाती है , ब्रेकअप के सीन का क्लाईमेक्स तब होता है जब बता कर दो खाते एक दूसरे को या तो बाय बाय कहते हैं या ब्लाक कर देते हैं। ये प्रक्रिया भी इतनी आसान नहीं होती ! दर्द में सरोबार TL देख कर तमाम follower गेट वेल सून का संदेश भेजने लगते हैं , दर्द फिर भी कम नहीं होता तो गीत -गज़ल -शेर शायरियां.......तमाम दवाइयां काम में ली जाती हैं। हालत ऐसे हो जाते हैं कि मरीज बस मरता नहीं है लेकिन लगता ऐसा है कि अभी मर ही जाएगा !!
फिर एक लम्बा सन्नाटा छा जाता है !! सीन से कोई एक गायब होता है और दूसरा मोदी -राहुल -केजरीवाल , बिग बॉस या क्रिकेट पर लिखने लगता है या किसी और के जीवन दर्शन से अपनी TL को गुलाबी कर रहा होता है। कुछ दिन ऐसे ही बीतते हैं , वक्त मरहम लगा देता है तो खोया हुआ खाता भी लौट आता है..... अपनी वापसी की घोषणा ऐसे करता है मानो स्वर्ग जीत के आया है या फिर से जिन्दा हुआ है !!
और फिर वही ज्ञान , अज्ञान , जीवन ,प्रेम..... विरक्ति की बातें करते करते फिर किसी रोज किसी रूमानियत का शिकार हो जाता है।
अद्दभुत माटी सा संसार है ये !! जीवन का असली दर्शन यहीं है...... सच यही है कि सच कुछ भी नहीं और झूठ मान कर भी क्या साबित कर सकते हो ? भीड़ है पर सब अकेले हैं ! चीखना चाहते हैं पर शब्द नहीं हैं ,आवाज़ है पर वक्त किसी के पास नहीं है !!
सब तरफ शोर है लेकिन यहाँ पार्क का वो एक कोना भी है जहाँ से चाँद , परिंदे , ख्वाहिशें और सरसराहट सब हासिल है.......टहलने के पगडन्डी है ! झील और समन्दर में उतरे चाँद तारे हैं , कंधों पर बोसा देता किसी का अहसास भी है ...... किसी का वजूद ही इश्क है तो कोई बांसुरी लिए राधा को खोज रहा है ! कोई बूँद से तृप्त है, कोई इश्क में सूफीयत के कलाम पढ़ रहा है !!
जो भी है , लज्जत है यहाँ ! चच्चा के चाय के अड्डे जैसी रौनक है... कुछ पल आईये ,बैठिये और निकल लीजिये ! इस रूमानियत को पारले जी मान चाय के साथ सुड़क लें और मुस्कुराते हुए निकल लें ....... असल जिन्दगी से दो चार होने के लिए जहाँ कंक्रीट है ,पैसे की लपकझपक है और आपके अपने हैं जो आपके हाथ से फोन छूटने का इंतज़ार कर रहे होते हैं..............!!
Thursday, 28 September 2017
मैं उसी को जीना चाहता हूँ ..उसी को चुन लेना चाहता हूँ ...!
वो कितनी आसानी से कह जाती है "इश्क आज़ाद कर देता है " ....... मैं हर बार सोच में सोच में पड़ जाता हूँ क्या मैं आज़ाद हूँ ? मुझे कई बार लगता है वो मुझे आजाद कर देना चाहती है खुद से ! ऐसा जितनी बार सोचता हूँ उतना ही उसकी गिरफ्त में आता जाता हूँ | मैं आजाद भी नहीं होना चाहता और उसके इश्क की इस परिभाषा को जीना भी चाहता हूँ |
नाम वाले रिश्तों में यही लिबर्टी तो नहीं होती फिर मैं क्यूँ ये लिबर्टी चाहता हूँ और दूसरे ही पल इस लिबर्टी से डर जाता हूँ | कशमकश में डाल देती हैं उसकी बातें ! नहीं समझना चाहता हूँ कोई परिभाषा , नहीं सोचना चाहता हूँ कि कैद में रहूँ या आज़ाद हो लूं ......
उससे पूछता हूँ कि आज़ाद कैसे हो जाऊं तो कहती है,इश्क यही सिखा रहा है , खुद से आज़ाद हो और वो करो जो जी चाहता है , वो चुनो जिसमें सुकून मिलता है , उस राह पर चलो जो तुमको तुम्हारे करीब लाती है.... वो कहती जाती है फिर हंस देती है !!
मैं उसी को जीना चाहता हूँ , उसी को चुन लेना चाहता हूँ और उसी राह पर चलना चाहता हूँ जो उसके कदमों के निशां दिखा रहे हैं !!
क्या मैं आजाद हूँ ? मैं इश्क में हूँ लेकिन आजाद नहीं हूँ ......
"अच्छा , तो फिर तुम मुझमें गिरफ्तार रहो और मेरे साथ मुझमें आजाद रहो ! मैं तुमको असमान छूते देखना चाहती हूँ , तुम मुझे पंख देना और अपने साथ उड़ान पर ले जाना " वो कहती है
आह ! चलो ना , यही तो मैं चाहता हूँ ! साझी आज़ादी और साझा गुलामी , तुम्हारे साथ मैं इश्क में आसमान हो जाना चाहता हूँ और तुमको अपने पंखो में समेट क्षितिज के उस पार ले जाना चाहता हूं जहाँ सिर्फ हम दोनों हों और हो हमारी जमीन ,हमारी ख्वाहिशों की खेती !
मेरा कहना और उसका आँचल से मुझे छू भर लेना मेरे हर सवाल का जवाब है ! वो मेरा इश्क,मेरे हौसलों की दास्ताँ है | मेरी ख्वाहिशों की पूरी फेहरिस्त है मेरी आज़ादी !