जिंदगी कितनी बार अचंभित करती है, खुद से खुद को अजनबी कर देती है और कभी खुद से ही ऐसे परिचय करवाती है जैसे बरसों पहले बिछड़ा कोई यार मिला हो !!
कई सवाल हैं और हर सवाल के कई जवाब ! जब मैं सवाल लेता हूँ तो जिंदगी के जवाब मुझे और सवाल दे जाते हैं और जब जिंदगी को जवाब देने की जुर्रत करता हूँ तो लगता है , ये हौसला कहाँ से आया मुझमें, कौन है मुझमें जो मुझसे ये सब करवा रहा है ?
मैं खुद में किरदार हूं और अपनी ही लिखी पटकथा को निभाता और उसकी आलोचना करता हूँ | अपने अभिनय पर खुद की ही पीठ थपथपाता हूँ ,कभी अपने ही किरदार पर लानतें बरसाता हूं !!!
ऐसा अक्सर होता है , एक क्षण लगने लगता है कि मैं बदल गया हूँ लेकिन अगले ही पल खुद उसी प्रतिक्रिया को जी रहा होता हूँ , जो मैं सोच रहा था कि अब वैसा कुछ नहीं होगा !! अजीब विरोधाभास है ! कभी लगता है कितना कुछ पीछे छोड़ आया हूँ , कितना कुछ बदला है आसपास ...........
पर ये सब कमरा बदलने जैसा है ! कमरा नया होता है ना ,पेंट पॉलिश.......सब नया लेकिन सामान तो सब नया नहीं होता और नया मैं भी कहां होता हूँ ? वैसा का वैसा सामान के साथ जैसे खुद को ला पटका हो ....... पर ये भी सच नहीं है , बदला मैं भी हूँ ! पहले जब खिड़की पार्क में खुलती थी तो मैं नीम और पीपल से बतियाता था और अब कंक्रीट की मीनार के सामने खड़ा पाता हूँ तो जैसे छैनी -हथौड़ी लिए बालकनी में खड़ा खुद को आज़माता हूँ ,सपनों को गढ़ता हूँ !! हाँ , बदला तो हूं !!
अपने भीतर की सम्भावनाओं को मैं सिरे से खारिज नहीं कर पाता और कभी खुद को ये यकीन नहीं दिला पाता कि वो मैं ही हूँ जो सम्भावनाओं को बना कर आया हूं !! एक अंतरिक्ष था मेरे भीतर ,जिसमें काला धुंआ था और उसमें बंद अनिश्चितता ,अनमनेपन की राख थी.......मैं वो छोड़ आया हूँ ! अब अनमनापन भी नहीं और अनिश्चितता भी नहीं लेकिन अब एक अजीब सी हड़बड़ी है जो सब कुछ जल्दी से ठीकठाक कर देना चाहती है |
ठीक क्या करना है ? खुद से सवाल करता हूँ !!
वही जो ठीक नहीं है !!
ठीक नहीं है यानी तुम खुश नहीं हो ?
किसने कहा कि खुश नहीं ? ये मेरे लिए सबसे बेहतरीन समय है , मैं खुद को जी पा रहा हूँ ,खुद के साथ समय बिता पा रहा हूँ !!
तो इतने उद्वेलित क्यों हो ?
मन कहता है ,सब ठीक है पर लगता है ये दुनिया के पैमाने पर सही नहीं है !!
तो तुम दुनिया की सोच रहे हो ?
शायद हाँ !!
हाँ ही है !! हम सब दुनिया के लिए ही पैदा हुए हैं और दुनिया के लिए मर जाते हैं , हमें यही सिखाया गया है ! ऐसे बोलें ,क्या बोलें,क्या करें ,क्या ना करें ,कब कैसे और कहाँ जाना है !! सब दुनिया ही बता रही है ....... तुम खुद से कब मिले थे , खुद को क्या कहा था ,खुद की कब मानी थी , तुम्हें याद भी नहीं होगा ......!!
सच में !! यही हुआ भी है ... अपने सवालों के जवाब में कितना भटक लिया और जवाब मुझे सवाल बन के मिले हैं ! मेरे भीतर अंतर्द्वंदों का जो अंतरिक्ष है ना, उसमें आकाश गंगा हूँ........ अरबों खरबों चाँद सितारे लिए जाने क्यों.... खुद को दूधिया नदी नहीं महसूस पाता और कभी जब उससे बतियाता हूँ तो उजली भोर बन जाता हूँ ,जो अपने साथ उजालों का एक पूरा संसार ले आती है...... मैं इसी पते पर रहना चाहता हूँ ,मेरी जिंदगी तुम मुझे चाँद -सितारों , उजालों का संसार देना , जवाब में मुझे खत लिखना और खत पर जिंदगी लिखना !!!