Thursday, 28 September 2017

मैं उसी को जीना चाहता हूँ ..उसी को चुन लेना चाहता हूँ ...!

वो कितनी आसानी से कह जाती है "इश्क आज़ाद कर देता है " ....... मैं हर बार सोच में सोच में पड़ जाता हूँ क्या मैं आज़ाद हूँ ? मुझे कई बार लगता है वो मुझे आजाद कर देना चाहती है खुद से ! ऐसा जितनी बार सोचता हूँ उतना ही उसकी गिरफ्त में आता जाता हूँ | मैं आजाद भी नहीं होना चाहता और उसके इश्क की इस परिभाषा को जीना भी चाहता हूँ |

नाम वाले रिश्तों में यही लिबर्टी तो नहीं होती फिर मैं क्यूँ ये लिबर्टी चाहता हूँ और दूसरे ही पल इस लिबर्टी से डर जाता हूँ | कशमकश में डाल देती हैं उसकी बातें ! नहीं समझना चाहता हूँ कोई परिभाषा , नहीं सोचना चाहता हूँ कि कैद में रहूँ या आज़ाद हो लूं ......

उससे पूछता हूँ कि आज़ाद कैसे हो जाऊं तो कहती है,इश्क यही सिखा रहा है , खुद से आज़ाद हो और वो करो जो जी चाहता है , वो चुनो जिसमें सुकून मिलता है , उस राह पर चलो जो तुमको तुम्हारे करीब लाती है.... वो कहती जाती है फिर हंस देती है !!

मैं उसी को जीना चाहता हूँ , उसी को चुन लेना चाहता हूँ और उसी राह पर चलना चाहता हूँ जो उसके कदमों के निशां दिखा रहे हैं !!

क्या मैं आजाद हूँ ? मैं इश्क में हूँ लेकिन आजाद नहीं हूँ ......

"अच्छा , तो फिर तुम मुझमें गिरफ्तार रहो और मेरे साथ मुझमें आजाद रहो ! मैं तुमको असमान छूते देखना चाहती हूँ , तुम मुझे पंख देना और अपने साथ उड़ान पर ले जाना " वो कहती है

आह ! चलो ना , यही तो मैं चाहता हूँ ! साझी आज़ादी और साझा गुलामी , तुम्हारे साथ मैं इश्क में आसमान हो जाना चाहता हूँ और तुमको अपने पंखो में समेट क्षितिज के उस पार ले जाना चाहता हूं जहाँ सिर्फ हम दोनों हों और हो हमारी जमीन ,हमारी ख्वाहिशों की खेती !

मेरा कहना और उसका आँचल से मुझे छू भर लेना मेरे हर सवाल का जवाब है ! वो मेरा इश्क,मेरे हौसलों की दास्ताँ है | मेरी ख्वाहिशों की पूरी फेहरिस्त है मेरी आज़ादी !

Wednesday, 27 September 2017

मैं सच में धान की बालियों संग इश्क़ में हूँ ..

मैं सच में धान की इन बालियों के इश्क में हूँ और केवल इन्हीं के नहीं बल्कि तमाम उन झूलती – बहकती अमियाँ की , कनखियों से देखती पीपल की चिकनी पत्तियों के भी इश्क में हूँ |
उनके बीच होता हूँ तो जिन्दगी आशिकी के उस तिलिस्मी संसार में ले जाती है, जहाँ बस मैं हूँ और मेरे आसपास उनकी नर्म छुअन ! अपने खेतों की मेढ़ों पर कितने भी करीने से कदम रखूं ,जाने कहाँ से कब उन की और फिसलता हूँ और उठता हूँ तो बदन पर उनकी गंध रह जाती है |
कितनी ही बार खेत किनारे लगे नीम के पेड़ के सहारे लगे हुए मैंने इन सबके बीच अपने को खुद से उलझते ,कभी खुद को पाते देखा है | किसी सुबह जब जमीन से फूटती उम्मीदें दिखाई पड़ती हैं तो उसी पल सपनों की फसल सच हुई लगने लगती है और किसी सुबह उनके ऊपर पडी ओस की बूदें उन सपनों से झिंझोड़ के जगा देती हैं ।
अपने खेतों –फसलों और आसपास रोपाई –कटाई करती औरतों के गीतों में मुझे गजब की लज्जत नजर आती है | देसी प्रेम है मेरा , खांटी देसी आशिकी करता हूँ |
भीगता हूँ इन बालियों के साथ और कभी भैंसों के बहाने उनको निहारते हुए खेत पार के मन्दिर तक चला जाता हूँ | यार दोस्त सब वहीं चौपाल लगाते हैं , सबकी अपनी अपनी दुनिया है पर सबकी आशिकी साझा है |
आज मन्दिर जाना था , जोया हुई है ना ! जोया हमारी नन्ही मेहमान है , अब तीन से चार भैंस बंधी हैं आंगन में .... उसके दूध को उबाल कर मन्दिर में चढाया गया और अब वो गाँव भर पी सकेगा | गीत सुन रहा था वहां ....... सोच रहा था , उत्सव के ऐसे मौके तो इश्क में ही आते हैं | मन कुछ भी नहीं छोड़ना चाहता |
गाँव सच में ऐसा ही है , धान की बालियों की सरसराहट भी वैसी ही है जैसी मैं उसके आँचल में महसूस करता हूँ | मैं इश्क में हूँ , खांटी आशिकी कर रहा हूँ नीम तले , जुगनुओं के बीच , उसको गुनगुना रहा हूँ ,जिसने मुझे इश्क में गाँव कर दिया है |

Sunday, 24 September 2017

गांव और शहर के बीच !

खूब घने पेड़ हैं आंगन में , नीम ,आंवला ,पीपल ,आम सब तो हैं ! छुटकी भी है एक , मां उधर धान फैलाती हैं और वो नन्हीं मुट्ठियों में भर पेड़ के नीचे बिखेर देती है उस चहचाहट के लिए जो आंगन को भरे रखती है | उससे उन गौरियाओं की इतनी पक्की दोस्ती है कि धान बिखेरते हुए उसी के कंधों पर आ बैठती हैं ! वो प्यार से झिड़कती ,बतियाती अपने खेल में मशगूल रहती है। माँ को बड़ी मम्मी कहती है। अपनी मां को उनके नाम से बुलाती है ,घर भर को सिर पर उठाये रहना उसका शगल है। कहती है शाम हो रही है इसको रोक लो ना , जिद ठान ली ! पूछा क्यों तो जवाब दिया कि इसके बाद रात आ जाएगी और फिर सुबह , फिर सुबह स्कूल जाना पड़ेगा ना................. कितना सब है इस आंगन में !

बाऊजी से मिलने आया था , एक्सीडेंट हो गया और तब से अस्पताल ,खेतों और ट्रेन के फेरे लगा रहा हूँ।जिंदगी किसी कथा -कहानी सी लगने लगी है , कोई एपीसोड उम्मीदों से भरा और कोई रेत सा फिसला लगता है। सब कुछ होने और कुछ भी न होने के बीच की परिभाषा ही तय नहीं कर पा रहा हूँ ,ना देख पा रहा हूँ कि जिंदगी किस दिशा में लिए जा रही है। एक पल के लिए लगता है कि सब कुछ हाथ से छूटता जा रहा है। पढ़ना चाहता था कि घर -परिवार और बाउजी के एक्सीडेंट ने उन जिम्मेदारियों को भी मेरे हिस्से कर दिया।

सब कुछ करते हुए भी कुछ ना कर पाने की गिल्ट घेर लेती है कभी और कभी इतने सुकून में होता हूँ कि जिंदगी गाँव किनारे पगडंडी पर लगी पेड़ों के झुरमुट सी लगती है जिस पर हजार खुशियाँ ,उम्मीदें चहचहा रही हैं और दिल उसी छाँव में पसरा है।

अब ये रोज की बात हो गयी है किसी के घर कोई बीमार हो तो मैं , किसी के बैंक का काम हो तो मैं और किसी के बच्चों को गाँव के मास्टरों को गलत पढ़ाते देख सही कराना हो तो मैं.......... ये उलझन मुझे रास आती है पर सवाल भी दे जाती है कि कब तक ?

कंक्रीट के उस जंगल में सब है बस रिश्ते नहीं हैं , यहाँ सब है पर रिश्तों की अपेक्षाओं और खुद की उपेक्षा की अमरबेल है जो गाहे बेगाहे मेरे इर्दगिर्द उग आती है।

क्या मैं गाँव हो गया हूँ या गाँव मुझसे छूट गया है और मैं शहर के किसी जाम में फंसा कोई अर्धशहरी हूँ ?