Thursday, 28 September 2017

मैं उसी को जीना चाहता हूँ ..उसी को चुन लेना चाहता हूँ ...!

वो कितनी आसानी से कह जाती है "इश्क आज़ाद कर देता है " ....... मैं हर बार सोच में सोच में पड़ जाता हूँ क्या मैं आज़ाद हूँ ? मुझे कई बार लगता है वो मुझे आजाद कर देना चाहती है खुद से ! ऐसा जितनी बार सोचता हूँ उतना ही उसकी गिरफ्त में आता जाता हूँ | मैं आजाद भी नहीं होना चाहता और उसके इश्क की इस परिभाषा को जीना भी चाहता हूँ |

नाम वाले रिश्तों में यही लिबर्टी तो नहीं होती फिर मैं क्यूँ ये लिबर्टी चाहता हूँ और दूसरे ही पल इस लिबर्टी से डर जाता हूँ | कशमकश में डाल देती हैं उसकी बातें ! नहीं समझना चाहता हूँ कोई परिभाषा , नहीं सोचना चाहता हूँ कि कैद में रहूँ या आज़ाद हो लूं ......

उससे पूछता हूँ कि आज़ाद कैसे हो जाऊं तो कहती है,इश्क यही सिखा रहा है , खुद से आज़ाद हो और वो करो जो जी चाहता है , वो चुनो जिसमें सुकून मिलता है , उस राह पर चलो जो तुमको तुम्हारे करीब लाती है.... वो कहती जाती है फिर हंस देती है !!

मैं उसी को जीना चाहता हूँ , उसी को चुन लेना चाहता हूँ और उसी राह पर चलना चाहता हूँ जो उसके कदमों के निशां दिखा रहे हैं !!

क्या मैं आजाद हूँ ? मैं इश्क में हूँ लेकिन आजाद नहीं हूँ ......

"अच्छा , तो फिर तुम मुझमें गिरफ्तार रहो और मेरे साथ मुझमें आजाद रहो ! मैं तुमको असमान छूते देखना चाहती हूँ , तुम मुझे पंख देना और अपने साथ उड़ान पर ले जाना " वो कहती है

आह ! चलो ना , यही तो मैं चाहता हूँ ! साझी आज़ादी और साझा गुलामी , तुम्हारे साथ मैं इश्क में आसमान हो जाना चाहता हूँ और तुमको अपने पंखो में समेट क्षितिज के उस पार ले जाना चाहता हूं जहाँ सिर्फ हम दोनों हों और हो हमारी जमीन ,हमारी ख्वाहिशों की खेती !

मेरा कहना और उसका आँचल से मुझे छू भर लेना मेरे हर सवाल का जवाब है ! वो मेरा इश्क,मेरे हौसलों की दास्ताँ है | मेरी ख्वाहिशों की पूरी फेहरिस्त है मेरी आज़ादी !

Wednesday, 27 September 2017

मैं सच में धान की बालियों संग इश्क़ में हूँ ..

मैं सच में धान की इन बालियों के इश्क में हूँ और केवल इन्हीं के नहीं बल्कि तमाम उन झूलती – बहकती अमियाँ की , कनखियों से देखती पीपल की चिकनी पत्तियों के भी इश्क में हूँ |
उनके बीच होता हूँ तो जिन्दगी आशिकी के उस तिलिस्मी संसार में ले जाती है, जहाँ बस मैं हूँ और मेरे आसपास उनकी नर्म छुअन ! अपने खेतों की मेढ़ों पर कितने भी करीने से कदम रखूं ,जाने कहाँ से कब उन की और फिसलता हूँ और उठता हूँ तो बदन पर उनकी गंध रह जाती है |
कितनी ही बार खेत किनारे लगे नीम के पेड़ के सहारे लगे हुए मैंने इन सबके बीच अपने को खुद से उलझते ,कभी खुद को पाते देखा है | किसी सुबह जब जमीन से फूटती उम्मीदें दिखाई पड़ती हैं तो उसी पल सपनों की फसल सच हुई लगने लगती है और किसी सुबह उनके ऊपर पडी ओस की बूदें उन सपनों से झिंझोड़ के जगा देती हैं ।
अपने खेतों –फसलों और आसपास रोपाई –कटाई करती औरतों के गीतों में मुझे गजब की लज्जत नजर आती है | देसी प्रेम है मेरा , खांटी देसी आशिकी करता हूँ |
भीगता हूँ इन बालियों के साथ और कभी भैंसों के बहाने उनको निहारते हुए खेत पार के मन्दिर तक चला जाता हूँ | यार दोस्त सब वहीं चौपाल लगाते हैं , सबकी अपनी अपनी दुनिया है पर सबकी आशिकी साझा है |
आज मन्दिर जाना था , जोया हुई है ना ! जोया हमारी नन्ही मेहमान है , अब तीन से चार भैंस बंधी हैं आंगन में .... उसके दूध को उबाल कर मन्दिर में चढाया गया और अब वो गाँव भर पी सकेगा | गीत सुन रहा था वहां ....... सोच रहा था , उत्सव के ऐसे मौके तो इश्क में ही आते हैं | मन कुछ भी नहीं छोड़ना चाहता |
गाँव सच में ऐसा ही है , धान की बालियों की सरसराहट भी वैसी ही है जैसी मैं उसके आँचल में महसूस करता हूँ | मैं इश्क में हूँ , खांटी आशिकी कर रहा हूँ नीम तले , जुगनुओं के बीच , उसको गुनगुना रहा हूँ ,जिसने मुझे इश्क में गाँव कर दिया है |

Sunday, 24 September 2017

गांव और शहर के बीच !

खूब घने पेड़ हैं आंगन में , नीम ,आंवला ,पीपल ,आम सब तो हैं ! छुटकी भी है एक , मां उधर धान फैलाती हैं और वो नन्हीं मुट्ठियों में भर पेड़ के नीचे बिखेर देती है उस चहचाहट के लिए जो आंगन को भरे रखती है | उससे उन गौरियाओं की इतनी पक्की दोस्ती है कि धान बिखेरते हुए उसी के कंधों पर आ बैठती हैं ! वो प्यार से झिड़कती ,बतियाती अपने खेल में मशगूल रहती है। माँ को बड़ी मम्मी कहती है। अपनी मां को उनके नाम से बुलाती है ,घर भर को सिर पर उठाये रहना उसका शगल है। कहती है शाम हो रही है इसको रोक लो ना , जिद ठान ली ! पूछा क्यों तो जवाब दिया कि इसके बाद रात आ जाएगी और फिर सुबह , फिर सुबह स्कूल जाना पड़ेगा ना................. कितना सब है इस आंगन में !

बाऊजी से मिलने आया था , एक्सीडेंट हो गया और तब से अस्पताल ,खेतों और ट्रेन के फेरे लगा रहा हूँ।जिंदगी किसी कथा -कहानी सी लगने लगी है , कोई एपीसोड उम्मीदों से भरा और कोई रेत सा फिसला लगता है। सब कुछ होने और कुछ भी न होने के बीच की परिभाषा ही तय नहीं कर पा रहा हूँ ,ना देख पा रहा हूँ कि जिंदगी किस दिशा में लिए जा रही है। एक पल के लिए लगता है कि सब कुछ हाथ से छूटता जा रहा है। पढ़ना चाहता था कि घर -परिवार और बाउजी के एक्सीडेंट ने उन जिम्मेदारियों को भी मेरे हिस्से कर दिया।

सब कुछ करते हुए भी कुछ ना कर पाने की गिल्ट घेर लेती है कभी और कभी इतने सुकून में होता हूँ कि जिंदगी गाँव किनारे पगडंडी पर लगी पेड़ों के झुरमुट सी लगती है जिस पर हजार खुशियाँ ,उम्मीदें चहचहा रही हैं और दिल उसी छाँव में पसरा है।

अब ये रोज की बात हो गयी है किसी के घर कोई बीमार हो तो मैं , किसी के बैंक का काम हो तो मैं और किसी के बच्चों को गाँव के मास्टरों को गलत पढ़ाते देख सही कराना हो तो मैं.......... ये उलझन मुझे रास आती है पर सवाल भी दे जाती है कि कब तक ?

कंक्रीट के उस जंगल में सब है बस रिश्ते नहीं हैं , यहाँ सब है पर रिश्तों की अपेक्षाओं और खुद की उपेक्षा की अमरबेल है जो गाहे बेगाहे मेरे इर्दगिर्द उग आती है।

क्या मैं गाँव हो गया हूँ या गाँव मुझसे छूट गया है और मैं शहर के किसी जाम में फंसा कोई अर्धशहरी हूँ ?

Thursday, 1 June 2017

मेरी पहचान हो तुम ..

क्या
अलग हो सकती है
सूरज से रोशनी उसकी ?

क्या
अलग हो सकते हैं
सितारे आसमान से ?

क्या अलग कर सका है कोई
हवाओं से हुनर उनका ?

शायद नहीं।

पर मैं,,,..ना सूरज हूँ
ना आसमान ना हवा कोई

पर सूरज का रोशनी से
हवाओं का गति से
और आसमान का सितारों से
वही संबंध हैं
जो शरीर का उसके नाम से है

तुमसे अलग होना
अपनी पहचान को
खुद से अलग कर देना है मेरे दोस्त


Tuesday, 30 May 2017

रामदास के सवाल

रामदास नाई के पिता हमारे खेतों की अधिया (बंटाई) पे बुवाई करते थे किसी वक़्त उनको पैसों की जरूरत पड़ी तो बाबूसाहब से कुछ पैसे ले लिये पर चुका नही पाए और गुज़र गए। उनकी मृत्यु के बाद रामदास को पता लगा कि उनके पिता जी ने क़र्ज़ ले रखा है जिसका सूद भी चुका पाना रामदास के बस की बात नही थी , सो पहले खेत गया फिर रामदास और उनके पीछे उनके बच्चे,रह गई उनकी बीवी जो अब बाबूसाहब के घर झाड़ू बर्तन के काम करती है।

सबकुछ एकदम प्रेमचंद्र की किसी कहानी के माफिक लगता है, रामदास एक उद्धरण मात्र हैं , गांवों में ऐसे कई रामदास आपको मिल जाएंगे जिन्होंने अपने पुरखों के कर्जे चुकाने में अपनी खेती अपनी मेहनत अपनी ज़िंदगी दे दी पर क़र्ज़ न चुका पाए।

रामदास और उनके बच्चे जी तोड़ मेहनत करते हैं मुम्बई में पर, इतना ही बचा पाते हैं कि बाबू साहब की सूद दे सकें, उनकी माँ जो बाबू साहब के यहां लउड़ींन है उनके घर चाय भी नही पीती क्योंकि बाबूसाहब ने एकबार लालमन (एक और कर्ज़दार जो उनके घर मे काम करता था) जब सारे क़र्ज़ उतार के जाने लगा तो उसके द्वारा बाबूसाहब के घर पिये गए अदरक वाली चाय के पैसे जोड़कर उसके नाम का नया खाता शुरू कर दिया था बाबूसाहब ने।
अपने उसी मड़ई में रहती हैं रामदास की मेहरारू और खाने का जुगाड़ दो और घरों में बर्तन मांज के कर लेती हैं।
आप भी सोच रहे होंगे कि क्यों मैं आज ये सब बता रहा हूँ ..तो बताते चलूं की नौकरी छोड़ने के दो महीने बाद ही मेरी स्थिति भी किसी रामदास सी हो गई है सो उनकी कठिनाइयों और इन अत्याचारों की तरफ,जो उनपर हो रहे हैं पर मेरा ध्यान जाना लाज़मी है।

ऐसे में एक मित्र जो बहुत खास हैं जिनसे कुछ भी छुपा नही है से अपनी व्यथा (रामदास की व्यथा) कही तो उन्होने कहा कि - ये सब पूर्व जन्मों के कर्म हैं जो अब फलित हो रहे हैं इनको भोगना ही होगा। सबको उसके कर्मों के आधार पर फल मिलता है जिसके अच्छे कर्म होंगे उसे अच्छे जिसके बुरे कर्म होंगे उसको बुरे।मेरे कहने पर कि मैं नहीं मानता इस बकवास को तो उन्होंने कहा कि मानो न मानो तुम्हारे मानने या न मानने से कुछ बदलने वाला नही, जो है उसे स्वीकार करो आसानी होगी भोगने में ।

धर्म के ठेकेदारों द्वारा गढ़ी गई कहानियों से उपजे इस तर्क को मानने का बिल्कुल तैयार नही था मेरा मन सो मारा गूगल और पाया कि वेदों में भी ऐसा ही कहा गया है, अब वेदों में कहा गया है तो सही ही कहा गया होगा, वेद तो गलत हो नही सकते ,ऊपर से मैं ब्राह्मण जो दोनों पहर पूजा करता हूँ खाने में घी नही डालता पर भगवान के लिए घी के दीपक जलाता हूँ , वेदों को गलत कहने का पाप कैसे कर सकता हूँ, सो चुपचाप घर आ गया।

पर मैं अब अकेला नही था रामदास भी उस चर्चा के साथ आ गया था मेरे साथ ,पर रामदास को नही पची ये बात और दाग दिए उसने कई सवाल...

क्या भगवान की न्याय व्यवस्था भी भारतीय न्याय प्रणाली से प्रेरित है?
क्या पांचवी में बस पास भर होने की पढ़ाई के बाद छठवीं में दिल लगाकर पढ़ने पे भी अनुत्तीर्ण कर दिया जाता है?
क्या पहली नौकरी में की गई गलतियों की सज़ा दूसरी नौकरी में देना उचित है ?
क्या गेहूं बोते समय ज्यादा खाद डालने से धान की पैदावार बढ़ जाती है?
ये जिंदगी तो क़र्ज़ उतारने में ही गुज़र गई और क़र्ज़ जस का तस है तो क्या अगले जन्म में भी इसी तरह कर्म कूटने हैं ?
अच्छा अगर बात ऐसी ही है तो क्या ये बाबूसाहब जो हमारा खून चूसकर बड़े आराम की ज़िंदगी जी रहे हैं क्या वो कोई ऋषि थे पिछले जन्म में ? और इतना अच्छा ही कर्म था इनका तो मोक्ष मिलना चाहिए था इनको!
क्या भगवान इतना अक्षम है कि उसको परिणाम सुनाने में दो जन्म लग जाते हैं ? अगर ऐसा है तो ऐसे अक्षम भगवान को पूजना बेकार है !

इतना सुनना था कि मेरे अंदर का ब्राह्मण जाग गया और रामदास को डांटते हुए बोला एक बाबूसाहब का हिसाब तो तुम से चुक नही रहा उपर से ऐसे सवाल करते हो भगवान से लाज न आती तुमको ? रामदास सहम गया पर सहमी आवाज में बोला बाबू हम तो बस इतना कह रहे थे की ई जो लेखा जोखा है भगवान का अगर ऐसा है तो हम तो कभी उऋण नही होने वाले।हमारा ई जनम तो बीत गया अगले में भी यही खटना है, और ई तो अन्याय है ..है कि नहीं ?

इतना सुनने के बाद मेरा मिज़ाज़ थोड़ा नरम हुआ पर कोई जवाब नही था मेरे पास उसके सवालों का सो उसे डपट कर बोला हम कोई भगवान के मुंशी तो हैं नही रामदास , जो सिफारिश लगवाएं उनसे, बस इतना जान लो कि अब यही भाग्य है तुम्हारा , स्वीकार लो तुमको भी दुःख कम होगा याद हैं ना मेरे मित्र की बात, सो जाओ रात काफी हो गई है !
रामदास गले मे अटके अंगोछे को सर के नीचे रख कर सो गया,पर मेरी नींद गायब थी। एफएम ऑन किया तो गाना बज रहा था ...

भला कीजै भला होगा, बुरा कीजै बुरा होगा
बही लिख लिख के क्या होगा, यहीं सब कुछ चुकाना है..सजन रे झूठ मत बोलो...

शैलेन्द्र का लिखा ये गीत बड़ा फेमस है और मेरा सबसे पसंदीदा भी...पर जाने क्यों मुझे अच्छा नहीं लग रहा है अब....

Sunday, 28 May 2017

ये जो दुनियां है..

ये जो दुनियां है
दिखावे की एक दुनिया है

हर एक चीज़
नुमाइश लिए रखी है

हर एक चीज़ की कीमत
लगाई जाती है

हर एक ख़्वाब की कीमत
चुकाई जाती है

पर इस दुनियां से इतर
तुम मेरी एक दुनियां हो

कोई हक़ तो नही है
कि तुमसे माँगू कुछ

पर अगर हो सके
तो आंखों मे बसाना मुझको

लाख कोशिश करे कोई
न दिखाना मुझको

छुपा के रखना
तशहीर न बनाना मुझको

प्यार हूँ इसकी कीमत न लगाना कोई ...

Saturday, 6 May 2017

शिकायतें खुद से कम कीजिये क्यूंकि जिससे इश्क में होते हैं उससे नाराज़ नहीं होते .....

उससे अक्सर बात होती है और हर बार मानो खुद से बात होती है ! वो जो कुछ कहता है ,मुझमें ही घटा लगता है ! आज भी कुछ ऐसा ही हुआ ......

" कितनी ही बार ऐसा होता है कि सब समेट के चलने लगते हैं और दो कदम भी नहीं पहुंचते कि सब कुछ फिर से बिखर जाता है | सुनो , सामान को समेटना आसान होता है लेकिन उस हौसले को हर बार समेटना मुश्किल होता है जो बमुश्किल ,हजार मिन्नतों के बाद दामन में ठहरा हो........ " वो कहता जा रहा था  |

" हजार ऐसे सवाल और हज़ार उनके जवाब हैं जो दे सकता हूँ पर खुद को बहला नहीं सकता कि वो सवाल गलत हैं या मेरे जवाब  !! जब दोनों ही सही हैं तो फिर गलत भी कुछ नहीं ,और जब गलत नहीं तो फिर इस सवाल -जवाब से हासिल भी कुछ नहीं ............".

" कोई समझता नहीं मुझको , सबको सिर्फ अपेक्षाएं हैं मुझसे ! मैं भी तो कुछ अपेक्षा रखता हूँ ,कौन पूछता है ? सबको अपनी फ़िक्र है ,सबकी अपनी दुनिया है ...... मैं नौकरी करता था तो दिन से वाबस्ता नहीं था ! उन लोगों से भी नहीं ,हाँ ..घरवालों  से भी यदाकदा बात करता था ! सबकी जरूरतें पूरी होती रहें ,मैं उनकी ख़ुशी में शामिल हूं या नहीं हूं......किसको फ़िक्र है ? "

मैं सुन रहा था  ! कई बार सुना और हर बार महसूस किया कि हम सब कितने असुरक्षित हैं जो ना उन रिश्तों से दूर जा पाते हैं और ना उनके साथ खुद को खुश रख पाते हैं जो हमारे कंधों पर हमारी ही इच्छा से सवार हैं और हमारे पैरों को ही कमजोर कर रहे हैं |

वो एक दिन कहने लगा "नौकरी के लिए घर परिवार से दूर रहना एक मजबूरी है लेकिन उस दूरी के साथ जो दूरी रिश्तों में चली आती है उसको कैसे पार किया जा सकता है | कई बार जब दिन की शिफ्ट में फीमेल कलीग को और रात में उसके हस्बैंड को ड्यूटी पर देखता हूँ तो लगता है कि ये कैसा रिश्ता है ? "

मैं क्या जवाब देता ? हाँ.......बच्चों और परिवार की जरूरतों के बीच के ये आर्थिक समीकरण रिश्तों की इक्वेशन को बिगाड़ देते हैं | उसको लगता है कि वो इसका हिस्सा बनता जा रहा है तो घबरा जाता है |

"आर्थिक जरूरतें समझौतों की हदें पार कर देती हैं | मन हो या न हो फिर भी मुस्कुराते हुए मिलना भी किसी नौटंकी सा  लगता है ! मैं थक गया हूँ इस सबसे ....... " वो झुंझला उठा !

"दोस्त आया था कहने लगा बात तलाक तक आ पहुंची है ! मैं हैरान था कि दोनों चार साल से एक दूसरे को जानते हैं और अब दो महीने शादी को नहीं हुए और बात इतनी बिगड़ गयी .......... ?"

वो एक पल में इस सबसे दूर चला जाना चाहता है और दूसरे ही पल अपनी नन्हीं भतीजी के खिलौने की फरमाइश और बहिन के भविष्य को लेकर चिंता करने लगता है |

उससे बात करते हुए महसूस कर रहा था कि उसकी बातें उस पूरी पीढ़ी के मन का आईना है जो पूरी तरह से ना संस्कारों को निभा पा रही है ना उनसे दूर ही जाना चाहती है | ऐसे टूटे हुए ,अधूरे मन से की गयी यात्राएं किस को , कौनसी मंजिल तक ले जाएंगी नहीं पता लेकिन ये जरूर दिख रहा है कि उनके -हमारे आसपास एक ऐसी छद्म दुनिया उग आयी है जो उन्हें ठग रही है |

उसके साथ बात करते हुए मैंने मेरी ही बात पर मुहर लगा ली कि वक्त कैसा भी हो ..... कभी वैसा नहीं होता जैसा हम चाहते हैं | वो वैसा होता है जैसा होता है और वैसा होने के लिए हम सब को भी मजबूर कर देता है |

आज वो किसी और ही मनः स्थिति में था और ये सब कह रहा था पर मुझे पता है अगली बार फिर जब उससे बात होगी तो वो फिर अपनी किसी उपलब्धि पर इतराता मिलेगा और उसी ऊर्जा के साथ सीढ़ीयां चढ़ता सबसे बतियाता और बहस में उलझा मिलेगा !

दोस्त ! हम सब ऐसे ही हैं , हम सब में कितने किरदार हैं ,हम सब में कितनी ही कहानियां हैं  ...........   ये सफर बेहद दिलचस्प है और इसका अंत उम्मीद से ज्यादा नाटकीय होता है !

मैं भी इसी मोहिनी दुनिया में जी रहा हूँ  आप भी जी लीजिये इसे जी भर के , शिकायतें खुद से कम कीजिये क्यूंकि जिससे इश्क में होते हैं उससे नाराज़ नहीं होते .....

Tuesday, 4 April 2017

मैं नदी हूँ ...

दुनिया की तमाम अच्छी बुरी चीजें समेटते हुए हज़ारों सालों से , हज़ारों मील से बहती आ रही मैं , मैं नदी हूँ !

मैं भारतीय नदी हूँ ! भारतीय इसलिए कहा क्योंकि ये शब्द नाम के आगे लगते ही मैं उस संस्कृति की वाहक हो जाती हूँ जिसे आप हज़ारों साल पुरानी सभ्यता के प्रतीक के तौर पर इस्तेमाल करते आये हैं। ये शब्द लगाते ही मैं  इतनी सम्माननीय हो जाती हूँ कि आप मुझे कभी देवी तो कभी माँ के नाम से पुकारने लगते हैं ..

आपकी व्याकरण ,आपके वेद मुझे स्त्री स्वरूपा , स्त्रीलिंग के रूप देखते हैं। हाँ , मैं भारतीय नारी का पर्याय हूँ।

ये सच भी है , इस समाज और संस्कृति ने हमें जीवनदायिनी और पवित्र माना है पर विडम्बना देखिये आज हम दोनों ही अपनी दुर्दशा पर शर्मिंदा है कि हमने अपनी कोख से कैसी संस्कृति ,कैसे समाज को जन्म दे दिया ?

आप पहले हमारी पूजा करते हैं और फिर हमारा ही बलात्कार  करते हैं , हमारी शुचिता की बात करते हैं फिर हमें ही गन्दा करते हैं ! अजीब समाज है ये , हमें ख़ास होने का रुतबा और ऊपर का दर्जा देता है ..फिर भी हमें सुरक्षा नहीं दे पाता। हम खुद को बचाने के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं और वो सिर्फ धर्म और संस्कृति की आड़ में हमारा दोहन कर रहे हैं।

मैं किताबों में हूँ  ,अखबारों में हूँ ,भाषणों में हूँ, नारों में हूँ . और तो और मैं सरकारी योजनाओं में भी हूँ ! मेरे नाम पर गंगा एक्शन प्लान ,नमामि गंगे ,जननी सुरक्षा जैसी योजनाएं बना करोड़ों रुपए बहा दिए जाते हैं  ...फिर भी मैं साफ़ कहां हूँ ? मैं फिर भी मैली होती ही जा रही हूँ ! सियासत के शूद्र  मुझमें नाले खोल रहे हैं , मुझे नालियों में बहने के लिए मजबूर कर रहे हैं।

अब जब कोई अपने भाषण में, अपने नारों में मेरा नाम लेता है तो मेरा दिल चीख उठता है ! हमारे वजूद पर बुरी नज़र रखने वाले ये सेठ -साहूकार , नेता हमसे कमाते हैं और हमें ही खत्म करने में लगे हैं।  ये वही लोग हैं जो 'यत्र नार्यस्तु पूज्यते रमन्ते तत्र देवता' का पाठ करते हैं और हमारा ही शोषण कर देवता बन घूमते हैं ..
मेरे पास जुबान होती तो मैं चिल्ला के कहती कि हमें पूजने वाला समाज का ये तबका ही हमारा सबसे बड़ा बैरी है !

आप मुझे माँ कहते हो ? हां ! मैं कुंती हूँ , द्रौपदी हूँ, मैं तुलसी हूँ , मैं वही गौ माता हूँ जो सदियों से समाज की त्रासदी और राजनीति का शिकार रही..और आज सियासत की गद्दी का पायदान बनकर रह गई हूँ।

मुझे विवाद की जड़ भी बना दिया आप लोगों ने। आप किस अधिकार से मुझपर अपने अधिकार की लड़ाई लड़ रहे हैं ? लड़ते आप हो क्योंकि स्वार्थ आपका है लेकिन  इसका दोष भी मेरे ऊपर मढ़ देते हो  .. आपकी भी क्या गलती ,आपको सिखाया यही गया कि ज़र ,जोरू और ज़मीन झगड़ों की जड़ है पर क्या ये सच में झगड़ा करवाती हैं ?  नहीं , ये आपकी हमें भोग की वस्तु मानने की प्रवृति है जो आपको झगड़ों में उलझाती है।

एक समय था जब मृत्यु शैय्या पर मेरी एक बूँद विष्णु लोक की राह बन जाती थी , पर मेरी ही सन्तानों ने मुझे इतना गन्दा कर दिया गया कि मैं अमृत , अब विषपान से कम नहीं हूँ ..

हाल ही में एक उच्च न्यायालय ने मेरे अधिकारों कि बात करते हुए मुझे मानवीय अधिकार दे दिए ..पर मुझे कोई उम्मीद नहीं है ..जिस देश में मनुष्यों को, जो आवाज बुलंद कर सकते हैं ,लड़ सकते हैं,अपने अधिकारों के लिये, उनके ही अधिकार सुरक्षित नही हैं ..तो मुझ गूंगी बहरी नदी के अधिकारों की सुरक्षा कैसे हो पाएगी?

ना दें आप मुझे सुरक्षा ,कोई शिकायत भी नहीं ! मैं नहीं चाहती कोई अधिकार ..मैं नहीं चाहती मेरी पूजा हो .बस .मैं जीना चाहती हूँ ...मैं बहना चाहती हूँ ..इस छोर से उस छोर तक बिना रुके..
मुझे जीने दें ,सांस लेने दे , मेरी कोख की पवित्रता बनी रहने दें ताकि आने वाली नस्लें आप पर शर्मिंदा ना हों...

Wednesday, 1 March 2017

झूठा राष्ट्रवाद और सच्चे देशद्रोही

आज के घटनाचक्र पर चर्चा,बहस और तमाम असहमतियों के बाद जब मेरे मित्र ने फोन रखा तो मन अचानक स्कूल के दिनों में चला गया। कैसे न जाता, राष्ट्रवाद और देशद्रोह जैसे शब्द जो आजकल हर गली हर नुक्कड़ पर चर्चा का विषय बने हुए हैं , से मेरी पहली मुलाकात जो हुई थी ।
"एक देश में रहने वाले सभी लोगों के विचारों ,मान्यताओं और परंपराओं का सम्मान करते हुए सबको एकता के सूत्र में बाँधने ,देश की संपत्तियों की सुरक्षा और उसकी अखडंता बनाए रखने की भावना को राष्ट्रवाद कहा जाता है" ..हां कुछ ऐसी ही परिभाषा बताई गई थी।

पर वर्तमान में जो राष्ट्रवाद देख सुन रहा हूँ कहीं भी इस परिभाषा में फिट बैठता नहीं दिखता।जाति ,धर्म का द्वेष फैला जब कोई दल राष्ट्रवाद की बात करता है तो मुझे उसका राष्ट्रवाद फ़र्ज़ी लगता है।
देश के लोगों को एकता के सूत्र में पिरोने के बजाय उनको खेमों में बाँट अपनी राजनीति की रोटियां सेंकता है तो मुझे उसका राष्ट्रवाद, राष्ट्रवाद नहीं धोखा लगता है ...

और तो और ये राष्ट्रवाद अब ऐसा रूप ले चुका है कि कोई सरकार का विरोध भी कर दे तो उसे सीधे राष्ट्रद्रोही करार दे दिया जाता है ...जिसको कवच बना असली राष्ट्रद्रोही बच निकलते हैं।
देश में बांटने की राजनीति सैकड़ो साल पुरानी है..पहले अंग्रेज करते थे ,अब हमारे ही चुने हुए नेता करते हैं ।
संविधान सभा में अपने भाषण में हमारे प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने कहा था-
"हमारा देश विविधताओं से भरा हुआ है और इतने धर्म,जाति ,वर्ग ,संस्कृतियों और भाषाओं में बंटा हुआ है कि इसको चलाने के लिए हमें एक विज़नरी की जरूरत होगी जो सबको साथ लेकर चल सके"
दुर्भाग्य से हम अब तक ऐसा नेता चुनने  में नाकाम रहे और दूर दूर तक ऐसी कोई संभावना भी नही दिखती।
भिन्नताओं से भरे हुए देश में मतों में भेद होना कोई  बुरी या नई बात नहीं ,बुरा होता है उसपर चर्चा किये बगैर उसको गलत या सही करार दे देना। जो सरकारें अब तक करती आई हैं और देती रहीं हैं जन्म विरोधों को।
पर विरोध कैसा हो ये भी एक मंथन का विषय है क्योंकि सरकार का विरोध करते करते हम देश की संप्रभुता और अखण्डता से खेलने लगे हैं ।

"जब कोई व्यक्ति अपने निजी स्वार्थ या किसी और कारण से देश की अखंडता और संप्रभुता के साथ समझौता करता है या ऐसा करने वालों का समर्थन करता है तो उसे देशद्रोही कहते हैं "

ये एक साधारण सी परिभाषा है जो सभी बच्चों को सिखाई जाती है ..पर हम भुलक्कड़ ठहरे कल की बातें भूल जाते हैं ..सालों पहले पढ़ाई  बात कौन याद रखे ?

कुछ दिन पहले देश के एक ख्याति प्राप्त विश्वविद्यालय में देश विरोधी नारे लगे ..भारत तेरे टुकड़े होंगे,कश्मीर मांगे आज़ादी, बस्तर मांगे आज़ादी।

ये बस नारे नहीं हैं ये वो आवाजें हैं जो कश्मीर के पत्थरबाजों और बस्तर के नक्सली तथा माओवादियों का खुला समर्थन करती हैं ... जो चीन और पाकिस्तान से पैसे और हथियार लेकर हमारे ही सैनिकों, हमारे लोगों को मारते हैं और इसको क्रान्ति का नाम दिया जा रहा है।

सरकारी आंकड़ों की बात करें तो 2010 से अबतक लगभग 5000 लोग इनकी भेंट चढ़ चुके हैं ।

महान समाजवादी नेता जय प्रकाश नारायण का कहना था -"एक हिंसक क्रांति हमेशा किसी न किसी तरह की तानाशाही लेकर आई है… क्रांति के बाद , धीरे-धीरे एक नया विशेषाधिकार प्राप्त शासकों एवं शोषकों का वर्ग खड़ा हो जाता है , लोग एक बार फिर जिसके अधीन हो जाते हैं"।

ये सब पढ़े लिखे एलाइट क्लास के लोग हैं जिनको ना बस्तर से मतलब है ना कश्मीर से।

ये असली देशद्रोही हैं और उन छद्म राष्ट्रवादियों से कहीं ज्यादा खतरनाक, पर इनको देशद्रोही कहना भी देश की राजनीती में भूचाल ले आता है ..क्योंकि इसको दूसरा ही रंग दे दिया जाता है

आधुनिक हथियारों से लैस बड़ी संख्या में आकर सैकड़ों सैनिकों को मौत के घाट उतारने वालो के समर्थक (?) अगर 'देशद्रोही' नहीं है तो क्या हैं ?

विरोध का ये कौन सा तरीका है जिसमे तमाम निर्दोषों को बंदूकों के भेंट चढ़ा दिया जाता है और फिर उनके समर्थन में महाविद्यालयों में नारे लगाए जाते हैं। हम इनको आतंकवादियों से अलग कैसे मान सकते हैं?

इसी देश में रहकर इसी के टुकड़े करने की बात करने वाले  अगर "देशद्रोही" नहीं हैं तो क्या हैं ?

वज़ीरों की दुश्मनी में जनता प्यादों की तरह पिटती रही है ,सियासत के इस खुनी खेल में निर्दोष जनता अपनी जान गंवाती आई है।

सत्ता के भूखे लोग नदियां पहाड़ जंगल तक खा जाते हैं ,इंसान की बिसात ही क्या। ये सब सत्ता की लड़ाई है इसे वैचारिक लड़ाई समझकर इसके भुलावे में मत आएं। सवाल करें खुद से और उनसे भी जो इसके झंडाबरदार हैं ..क्योंकि नुकसान हर बार आपका ही होता आया है