Sunday, 8 January 2017

तुम क्या हो ?

तुमको सूरज कहूँ ?
जो झांकती हो मेरी आँखों में
इतनी रौशनी लिये हर सुबह

या कहूँ सर्दियों के वो सुनहरे धूप वाले दिन
जिनके साए में पड़े रहना अच्छा लगता है

तुमको शाम कहूँ क्या?
जो लेकर आती हो इतने सारे रंग अपने साथ

या फिर कहूँ रात?
जिसके आँचल में टिमटिमाते हैं तारे 
और चमकता है चाँद माथे पर
किसी बिंदी जैसा...

जब होता है मन
कुछ पढ़ने का
तो तुम बन जाती हो किताब

जो लिखने बैठूं
तो तैरती हो ज़ेहन में
खूबसूरत खयाल बनकर

मिलती हो तुम मुझे
शोर में किसी गहरी चुप्पी सी

होती हो मेरे शांत से कमरे में,किसी सुरमई धुन पे थिरकती सी

दिन-रात
सुबह-शाम 

हर वक़्त
हर ओर
हर रूप में,तुम ही होती हो

तुमको कायनात कहूँ क्या?

गिरवी रखे कुछ सामान...

बेफ़िक्री के वो दिन 
कुछ रात ख्यालों वाली 

आँखों की वो पहली नींद
उस नींद में देखे पहले ख्वाब

भावनाओं में डूबे

वो हसीन पल..

तुम्हारे जूड़े के फेरों से लिपटे हुए 
उस फूल की कुछ पंखुड़ियां 
जो सूख गईं हैं अब
किताब के किसी पन्नों तले

तुम्हारी लटों को घुमावदार बनाते 
मेरी उँगलियों के वो स्पर्श 

कभी निराशा के दिनों में 
तुमसे लिपट के रोते हुए 
तुम्हारे सीने में उतारी हुई 
मेरी कुछ उदासियाँ…

हम एक दूसरे को 
वापस नहीं कर सके 

ये एक अमानत है
जो हमने 
अपने प्रेम को
अपने साथ बनाए रखने की चाह में 
एक दूसरे के पास 
गिरवी रख दिया था…

पर ...
वो प्रेम खो गया कहीं 
उन रिवाज़ों के जंगल से गुजरते वक़्त..

तुमसे भी और मुझसे भी। 

अब वो गिरवी रखे कुछ सामान 
हम एक दूसरे से छुड़ा नहीं पाएंगे कभी

छूट गया बहुत कुछ...

गाँव छोड़ते हुए
छूट गया गाँव में
बहुत कुछ

छूट गये..

साँझ ढ़ले
पेड़ों में समाते
तोतों के झुंड

चिड़ियों का शोर

क्षितिज की लाली

बाँसों के झुरमुट में टँगा चाँद
चाँद से बतियाती
कोई जंगली बेल

झिँगुरो के
पायल छनकाते से बोल

पीपल के पेड़ पे टिमटिमाते जुगनुओ का बसेरा..

छूट गईं
दरवाजे से लगी दो आँखे
जो हर वक़्त इंतजार में डूबी रहती थी

छूट गये
सोंधी मिट्टी के दालान

गाती हुई ऋतुएँ….

छूट गया एक आँचल..
जो दुलार से
कभी माथे का पसीना
तो कभी तकलीफ में बहे अश्रुओं को सुखाया करते थे

छूट गये वो हाथ..
जो कभी गिरने पर
हथेलियों की थपकी से…फ़िर से दुर तक जाने का हौसला दिया करते थे..

छूटने छोड़ने के बीच
जो साथ आया वो मेरा नहीँ था..

साथ आये कुछ सपने..
जिसे किसी और ने मेरे लिये देखे थे…

साथ में आई कुछ उम्मीदें..
जो घर से निकलते वक़्त किसी ने मेरी कलाइयों में टाँक दिया..

साथ चली आई कुछ स्मृतियां उन चेहरों की…जिनपर वक़्त ने झुर्रियों के निशान डालने शुरू कर दिये थे..

साथ आई
कुछ पीड़ा..सबकुछ छूट जाने की…
जो आज भी कभी कभी मन में टीसती है रह रह कर…

मनचाही चीजों को छोड़ अनचाहे को पाने के क्रम में..कब गाँव की पगडंडियों से चलते शहर की चौड़ी सड़को पे आया पता नहीँ चला..

पर इन पांवों में अब वो अल्हड़पन नहीँ जो खेतों के बीच दौड़ते वक़्त हुआ करती थी..

अब बड़ी संजीदगी से धरता हूँ पाँव…बहुत दूर तक जाती हुई इन कंक्रीट की सड़कों पर…

ताकि जख्मी ना हो जाएँ उन सपनों के पाँव जो किसी ने मेरे लिये देखे हैं..
कहीँ गिरकर टूट ना जाएँ वो उम्मीदें…जो किसी ने बड़ी उम्मीद से मेरी कलाइयों पे टाँके हैं…

अब….

जाना है दूर तक उन सपनों के लिये…जागना है देर तक उन उम्मीदों पे खरा उतरने के लिये…

जो मेरे नहीँ हैं

Saturday, 7 January 2017

वो कहती है मुझे इश्क़ नहीं तुमसे ..

वो कहती है मुझे इश्क नहीँ तुमसे…

हाँ पर मेरे हर ख़याल में तुम होते हो
हर फूल में तुमको देखती हूँ
जब हवाएं छूकर गुजरती हैं
तो ऐसा लगता है
जैसे मुझे छूकर गुजरे हो तुम….
ज़ुल्फो में अटकी बूँदें जो कभी अठखेलियाँ करती हैं..
तो उनमें भी तुम्हारी उँगलियों की जुम्बिश महसूस करती हूँ और तुम्हारे स्पर्श के
ये मोती कहीँ गिरकर बिखर ना जाएँ…इसलिये उनको अपने  हथेलियों में लेकर तुम्हारे छुअन से उपजी गुदगुदी को महसूस करती हूँ..
शानों से लहराते मेरे आँचल ..तुम्हारी ही कोई शरारत लगती हैं..

कभी रात जब बहुत गहरी मालूम होती है ..तो उन गहरे अँधेरों में जल रहे दिये की लौ में तुमको पाती हूँ
जब रात के बाद सूरज निकलता है… तो सूरज की उन पहली सुनहरी किरणो की लालिमा में तुम्हारा अक्स नज़र आता है…
दोपहर की जलती हुई धूप में पेड़ के छाये भी तुम्हारे साये की तरह लगते हैं..
शाम जब भी उदास होती है …अपनी नज्मों में तुमको गुनगुनाती हूँ मैं..और शाम गुलज़ार हो जातीं है…

अब मैं इबादत नहीं करती 
मैं भूल गई हूं इबादत करना और अब तुम्हारा नाम लेती हूँ…
भूल गई हूँ सबकुछ….बस एक तुम हो…जो मुझे याद रह गये हो…

पर जब भी उससे कहता हूँ की ये इश्क नहीं तो क्या है  ?

तो कहती है वो..मुझे अब इश्क नही तुमसे

अब मैं तुम्हारी इबादत करती हूँ…किसी खुदा कि तरह…

जो कभी किसी को नहीँ मिलता…..