Tuesday, 30 May 2017

रामदास के सवाल

रामदास नाई के पिता हमारे खेतों की अधिया (बंटाई) पे बुवाई करते थे किसी वक़्त उनको पैसों की जरूरत पड़ी तो बाबूसाहब से कुछ पैसे ले लिये पर चुका नही पाए और गुज़र गए। उनकी मृत्यु के बाद रामदास को पता लगा कि उनके पिता जी ने क़र्ज़ ले रखा है जिसका सूद भी चुका पाना रामदास के बस की बात नही थी , सो पहले खेत गया फिर रामदास और उनके पीछे उनके बच्चे,रह गई उनकी बीवी जो अब बाबूसाहब के घर झाड़ू बर्तन के काम करती है।

सबकुछ एकदम प्रेमचंद्र की किसी कहानी के माफिक लगता है, रामदास एक उद्धरण मात्र हैं , गांवों में ऐसे कई रामदास आपको मिल जाएंगे जिन्होंने अपने पुरखों के कर्जे चुकाने में अपनी खेती अपनी मेहनत अपनी ज़िंदगी दे दी पर क़र्ज़ न चुका पाए।

रामदास और उनके बच्चे जी तोड़ मेहनत करते हैं मुम्बई में पर, इतना ही बचा पाते हैं कि बाबू साहब की सूद दे सकें, उनकी माँ जो बाबू साहब के यहां लउड़ींन है उनके घर चाय भी नही पीती क्योंकि बाबूसाहब ने एकबार लालमन (एक और कर्ज़दार जो उनके घर मे काम करता था) जब सारे क़र्ज़ उतार के जाने लगा तो उसके द्वारा बाबूसाहब के घर पिये गए अदरक वाली चाय के पैसे जोड़कर उसके नाम का नया खाता शुरू कर दिया था बाबूसाहब ने।
अपने उसी मड़ई में रहती हैं रामदास की मेहरारू और खाने का जुगाड़ दो और घरों में बर्तन मांज के कर लेती हैं।
आप भी सोच रहे होंगे कि क्यों मैं आज ये सब बता रहा हूँ ..तो बताते चलूं की नौकरी छोड़ने के दो महीने बाद ही मेरी स्थिति भी किसी रामदास सी हो गई है सो उनकी कठिनाइयों और इन अत्याचारों की तरफ,जो उनपर हो रहे हैं पर मेरा ध्यान जाना लाज़मी है।

ऐसे में एक मित्र जो बहुत खास हैं जिनसे कुछ भी छुपा नही है से अपनी व्यथा (रामदास की व्यथा) कही तो उन्होने कहा कि - ये सब पूर्व जन्मों के कर्म हैं जो अब फलित हो रहे हैं इनको भोगना ही होगा। सबको उसके कर्मों के आधार पर फल मिलता है जिसके अच्छे कर्म होंगे उसे अच्छे जिसके बुरे कर्म होंगे उसको बुरे।मेरे कहने पर कि मैं नहीं मानता इस बकवास को तो उन्होंने कहा कि मानो न मानो तुम्हारे मानने या न मानने से कुछ बदलने वाला नही, जो है उसे स्वीकार करो आसानी होगी भोगने में ।

धर्म के ठेकेदारों द्वारा गढ़ी गई कहानियों से उपजे इस तर्क को मानने का बिल्कुल तैयार नही था मेरा मन सो मारा गूगल और पाया कि वेदों में भी ऐसा ही कहा गया है, अब वेदों में कहा गया है तो सही ही कहा गया होगा, वेद तो गलत हो नही सकते ,ऊपर से मैं ब्राह्मण जो दोनों पहर पूजा करता हूँ खाने में घी नही डालता पर भगवान के लिए घी के दीपक जलाता हूँ , वेदों को गलत कहने का पाप कैसे कर सकता हूँ, सो चुपचाप घर आ गया।

पर मैं अब अकेला नही था रामदास भी उस चर्चा के साथ आ गया था मेरे साथ ,पर रामदास को नही पची ये बात और दाग दिए उसने कई सवाल...

क्या भगवान की न्याय व्यवस्था भी भारतीय न्याय प्रणाली से प्रेरित है?
क्या पांचवी में बस पास भर होने की पढ़ाई के बाद छठवीं में दिल लगाकर पढ़ने पे भी अनुत्तीर्ण कर दिया जाता है?
क्या पहली नौकरी में की गई गलतियों की सज़ा दूसरी नौकरी में देना उचित है ?
क्या गेहूं बोते समय ज्यादा खाद डालने से धान की पैदावार बढ़ जाती है?
ये जिंदगी तो क़र्ज़ उतारने में ही गुज़र गई और क़र्ज़ जस का तस है तो क्या अगले जन्म में भी इसी तरह कर्म कूटने हैं ?
अच्छा अगर बात ऐसी ही है तो क्या ये बाबूसाहब जो हमारा खून चूसकर बड़े आराम की ज़िंदगी जी रहे हैं क्या वो कोई ऋषि थे पिछले जन्म में ? और इतना अच्छा ही कर्म था इनका तो मोक्ष मिलना चाहिए था इनको!
क्या भगवान इतना अक्षम है कि उसको परिणाम सुनाने में दो जन्म लग जाते हैं ? अगर ऐसा है तो ऐसे अक्षम भगवान को पूजना बेकार है !

इतना सुनना था कि मेरे अंदर का ब्राह्मण जाग गया और रामदास को डांटते हुए बोला एक बाबूसाहब का हिसाब तो तुम से चुक नही रहा उपर से ऐसे सवाल करते हो भगवान से लाज न आती तुमको ? रामदास सहम गया पर सहमी आवाज में बोला बाबू हम तो बस इतना कह रहे थे की ई जो लेखा जोखा है भगवान का अगर ऐसा है तो हम तो कभी उऋण नही होने वाले।हमारा ई जनम तो बीत गया अगले में भी यही खटना है, और ई तो अन्याय है ..है कि नहीं ?

इतना सुनने के बाद मेरा मिज़ाज़ थोड़ा नरम हुआ पर कोई जवाब नही था मेरे पास उसके सवालों का सो उसे डपट कर बोला हम कोई भगवान के मुंशी तो हैं नही रामदास , जो सिफारिश लगवाएं उनसे, बस इतना जान लो कि अब यही भाग्य है तुम्हारा , स्वीकार लो तुमको भी दुःख कम होगा याद हैं ना मेरे मित्र की बात, सो जाओ रात काफी हो गई है !
रामदास गले मे अटके अंगोछे को सर के नीचे रख कर सो गया,पर मेरी नींद गायब थी। एफएम ऑन किया तो गाना बज रहा था ...

भला कीजै भला होगा, बुरा कीजै बुरा होगा
बही लिख लिख के क्या होगा, यहीं सब कुछ चुकाना है..सजन रे झूठ मत बोलो...

शैलेन्द्र का लिखा ये गीत बड़ा फेमस है और मेरा सबसे पसंदीदा भी...पर जाने क्यों मुझे अच्छा नहीं लग रहा है अब....

Sunday, 28 May 2017

ये जो दुनियां है..

ये जो दुनियां है
दिखावे की एक दुनिया है

हर एक चीज़
नुमाइश लिए रखी है

हर एक चीज़ की कीमत
लगाई जाती है

हर एक ख़्वाब की कीमत
चुकाई जाती है

पर इस दुनियां से इतर
तुम मेरी एक दुनियां हो

कोई हक़ तो नही है
कि तुमसे माँगू कुछ

पर अगर हो सके
तो आंखों मे बसाना मुझको

लाख कोशिश करे कोई
न दिखाना मुझको

छुपा के रखना
तशहीर न बनाना मुझको

प्यार हूँ इसकी कीमत न लगाना कोई ...

Saturday, 6 May 2017

शिकायतें खुद से कम कीजिये क्यूंकि जिससे इश्क में होते हैं उससे नाराज़ नहीं होते .....

उससे अक्सर बात होती है और हर बार मानो खुद से बात होती है ! वो जो कुछ कहता है ,मुझमें ही घटा लगता है ! आज भी कुछ ऐसा ही हुआ ......

" कितनी ही बार ऐसा होता है कि सब समेट के चलने लगते हैं और दो कदम भी नहीं पहुंचते कि सब कुछ फिर से बिखर जाता है | सुनो , सामान को समेटना आसान होता है लेकिन उस हौसले को हर बार समेटना मुश्किल होता है जो बमुश्किल ,हजार मिन्नतों के बाद दामन में ठहरा हो........ " वो कहता जा रहा था  |

" हजार ऐसे सवाल और हज़ार उनके जवाब हैं जो दे सकता हूँ पर खुद को बहला नहीं सकता कि वो सवाल गलत हैं या मेरे जवाब  !! जब दोनों ही सही हैं तो फिर गलत भी कुछ नहीं ,और जब गलत नहीं तो फिर इस सवाल -जवाब से हासिल भी कुछ नहीं ............".

" कोई समझता नहीं मुझको , सबको सिर्फ अपेक्षाएं हैं मुझसे ! मैं भी तो कुछ अपेक्षा रखता हूँ ,कौन पूछता है ? सबको अपनी फ़िक्र है ,सबकी अपनी दुनिया है ...... मैं नौकरी करता था तो दिन से वाबस्ता नहीं था ! उन लोगों से भी नहीं ,हाँ ..घरवालों  से भी यदाकदा बात करता था ! सबकी जरूरतें पूरी होती रहें ,मैं उनकी ख़ुशी में शामिल हूं या नहीं हूं......किसको फ़िक्र है ? "

मैं सुन रहा था  ! कई बार सुना और हर बार महसूस किया कि हम सब कितने असुरक्षित हैं जो ना उन रिश्तों से दूर जा पाते हैं और ना उनके साथ खुद को खुश रख पाते हैं जो हमारे कंधों पर हमारी ही इच्छा से सवार हैं और हमारे पैरों को ही कमजोर कर रहे हैं |

वो एक दिन कहने लगा "नौकरी के लिए घर परिवार से दूर रहना एक मजबूरी है लेकिन उस दूरी के साथ जो दूरी रिश्तों में चली आती है उसको कैसे पार किया जा सकता है | कई बार जब दिन की शिफ्ट में फीमेल कलीग को और रात में उसके हस्बैंड को ड्यूटी पर देखता हूँ तो लगता है कि ये कैसा रिश्ता है ? "

मैं क्या जवाब देता ? हाँ.......बच्चों और परिवार की जरूरतों के बीच के ये आर्थिक समीकरण रिश्तों की इक्वेशन को बिगाड़ देते हैं | उसको लगता है कि वो इसका हिस्सा बनता जा रहा है तो घबरा जाता है |

"आर्थिक जरूरतें समझौतों की हदें पार कर देती हैं | मन हो या न हो फिर भी मुस्कुराते हुए मिलना भी किसी नौटंकी सा  लगता है ! मैं थक गया हूँ इस सबसे ....... " वो झुंझला उठा !

"दोस्त आया था कहने लगा बात तलाक तक आ पहुंची है ! मैं हैरान था कि दोनों चार साल से एक दूसरे को जानते हैं और अब दो महीने शादी को नहीं हुए और बात इतनी बिगड़ गयी .......... ?"

वो एक पल में इस सबसे दूर चला जाना चाहता है और दूसरे ही पल अपनी नन्हीं भतीजी के खिलौने की फरमाइश और बहिन के भविष्य को लेकर चिंता करने लगता है |

उससे बात करते हुए महसूस कर रहा था कि उसकी बातें उस पूरी पीढ़ी के मन का आईना है जो पूरी तरह से ना संस्कारों को निभा पा रही है ना उनसे दूर ही जाना चाहती है | ऐसे टूटे हुए ,अधूरे मन से की गयी यात्राएं किस को , कौनसी मंजिल तक ले जाएंगी नहीं पता लेकिन ये जरूर दिख रहा है कि उनके -हमारे आसपास एक ऐसी छद्म दुनिया उग आयी है जो उन्हें ठग रही है |

उसके साथ बात करते हुए मैंने मेरी ही बात पर मुहर लगा ली कि वक्त कैसा भी हो ..... कभी वैसा नहीं होता जैसा हम चाहते हैं | वो वैसा होता है जैसा होता है और वैसा होने के लिए हम सब को भी मजबूर कर देता है |

आज वो किसी और ही मनः स्थिति में था और ये सब कह रहा था पर मुझे पता है अगली बार फिर जब उससे बात होगी तो वो फिर अपनी किसी उपलब्धि पर इतराता मिलेगा और उसी ऊर्जा के साथ सीढ़ीयां चढ़ता सबसे बतियाता और बहस में उलझा मिलेगा !

दोस्त ! हम सब ऐसे ही हैं , हम सब में कितने किरदार हैं ,हम सब में कितनी ही कहानियां हैं  ...........   ये सफर बेहद दिलचस्प है और इसका अंत उम्मीद से ज्यादा नाटकीय होता है !

मैं भी इसी मोहिनी दुनिया में जी रहा हूँ  आप भी जी लीजिये इसे जी भर के , शिकायतें खुद से कम कीजिये क्यूंकि जिससे इश्क में होते हैं उससे नाराज़ नहीं होते .....