रामदास नाई के पिता हमारे खेतों की अधिया (बंटाई) पे बुवाई करते थे किसी वक़्त उनको पैसों की जरूरत पड़ी तो बाबूसाहब से कुछ पैसे ले लिये पर चुका नही पाए और गुज़र गए। उनकी मृत्यु के बाद रामदास को पता लगा कि उनके पिता जी ने क़र्ज़ ले रखा है जिसका सूद भी चुका पाना रामदास के बस की बात नही थी , सो पहले खेत गया फिर रामदास और उनके पीछे उनके बच्चे,रह गई उनकी बीवी जो अब बाबूसाहब के घर झाड़ू बर्तन के काम करती है।
सबकुछ एकदम प्रेमचंद्र की किसी कहानी के माफिक लगता है, रामदास एक उद्धरण मात्र हैं , गांवों में ऐसे कई रामदास आपको मिल जाएंगे जिन्होंने अपने पुरखों के कर्जे चुकाने में अपनी खेती अपनी मेहनत अपनी ज़िंदगी दे दी पर क़र्ज़ न चुका पाए।
रामदास और उनके बच्चे जी तोड़ मेहनत करते हैं मुम्बई में पर, इतना ही बचा पाते हैं कि बाबू साहब की सूद दे सकें, उनकी माँ जो बाबू साहब के यहां लउड़ींन है उनके घर चाय भी नही पीती क्योंकि बाबूसाहब ने एकबार लालमन (एक और कर्ज़दार जो उनके घर मे काम करता था) जब सारे क़र्ज़ उतार के जाने लगा तो उसके द्वारा बाबूसाहब के घर पिये गए अदरक वाली चाय के पैसे जोड़कर उसके नाम का नया खाता शुरू कर दिया था बाबूसाहब ने।
अपने उसी मड़ई में रहती हैं रामदास की मेहरारू और खाने का जुगाड़ दो और घरों में बर्तन मांज के कर लेती हैं।
आप भी सोच रहे होंगे कि क्यों मैं आज ये सब बता रहा हूँ ..तो बताते चलूं की नौकरी छोड़ने के दो महीने बाद ही मेरी स्थिति भी किसी रामदास सी हो गई है सो उनकी कठिनाइयों और इन अत्याचारों की तरफ,जो उनपर हो रहे हैं पर मेरा ध्यान जाना लाज़मी है।
ऐसे में एक मित्र जो बहुत खास हैं जिनसे कुछ भी छुपा नही है से अपनी व्यथा (रामदास की व्यथा) कही तो उन्होने कहा कि - ये सब पूर्व जन्मों के कर्म हैं जो अब फलित हो रहे हैं इनको भोगना ही होगा। सबको उसके कर्मों के आधार पर फल मिलता है जिसके अच्छे कर्म होंगे उसे अच्छे जिसके बुरे कर्म होंगे उसको बुरे।मेरे कहने पर कि मैं नहीं मानता इस बकवास को तो उन्होंने कहा कि मानो न मानो तुम्हारे मानने या न मानने से कुछ बदलने वाला नही, जो है उसे स्वीकार करो आसानी होगी भोगने में ।
धर्म के ठेकेदारों द्वारा गढ़ी गई कहानियों से उपजे इस तर्क को मानने का बिल्कुल तैयार नही था मेरा मन सो मारा गूगल और पाया कि वेदों में भी ऐसा ही कहा गया है, अब वेदों में कहा गया है तो सही ही कहा गया होगा, वेद तो गलत हो नही सकते ,ऊपर से मैं ब्राह्मण जो दोनों पहर पूजा करता हूँ खाने में घी नही डालता पर भगवान के लिए घी के दीपक जलाता हूँ , वेदों को गलत कहने का पाप कैसे कर सकता हूँ, सो चुपचाप घर आ गया।
पर मैं अब अकेला नही था रामदास भी उस चर्चा के साथ आ गया था मेरे साथ ,पर रामदास को नही पची ये बात और दाग दिए उसने कई सवाल...
क्या भगवान की न्याय व्यवस्था भी भारतीय न्याय प्रणाली से प्रेरित है?
क्या पांचवी में बस पास भर होने की पढ़ाई के बाद छठवीं में दिल लगाकर पढ़ने पे भी अनुत्तीर्ण कर दिया जाता है?
क्या पहली नौकरी में की गई गलतियों की सज़ा दूसरी नौकरी में देना उचित है ?
क्या गेहूं बोते समय ज्यादा खाद डालने से धान की पैदावार बढ़ जाती है?
ये जिंदगी तो क़र्ज़ उतारने में ही गुज़र गई और क़र्ज़ जस का तस है तो क्या अगले जन्म में भी इसी तरह कर्म कूटने हैं ?
अच्छा अगर बात ऐसी ही है तो क्या ये बाबूसाहब जो हमारा खून चूसकर बड़े आराम की ज़िंदगी जी रहे हैं क्या वो कोई ऋषि थे पिछले जन्म में ? और इतना अच्छा ही कर्म था इनका तो मोक्ष मिलना चाहिए था इनको!
क्या भगवान इतना अक्षम है कि उसको परिणाम सुनाने में दो जन्म लग जाते हैं ? अगर ऐसा है तो ऐसे अक्षम भगवान को पूजना बेकार है !
इतना सुनना था कि मेरे अंदर का ब्राह्मण जाग गया और रामदास को डांटते हुए बोला एक बाबूसाहब का हिसाब तो तुम से चुक नही रहा उपर से ऐसे सवाल करते हो भगवान से लाज न आती तुमको ? रामदास सहम गया पर सहमी आवाज में बोला बाबू हम तो बस इतना कह रहे थे की ई जो लेखा जोखा है भगवान का अगर ऐसा है तो हम तो कभी उऋण नही होने वाले।हमारा ई जनम तो बीत गया अगले में भी यही खटना है, और ई तो अन्याय है ..है कि नहीं ?
इतना सुनने के बाद मेरा मिज़ाज़ थोड़ा नरम हुआ पर कोई जवाब नही था मेरे पास उसके सवालों का सो उसे डपट कर बोला हम कोई भगवान के मुंशी तो हैं नही रामदास , जो सिफारिश लगवाएं उनसे, बस इतना जान लो कि अब यही भाग्य है तुम्हारा , स्वीकार लो तुमको भी दुःख कम होगा याद हैं ना मेरे मित्र की बात, सो जाओ रात काफी हो गई है !
रामदास गले मे अटके अंगोछे को सर के नीचे रख कर सो गया,पर मेरी नींद गायब थी। एफएम ऑन किया तो गाना बज रहा था ...
भला कीजै भला होगा, बुरा कीजै बुरा होगा
बही लिख लिख के क्या होगा, यहीं सब कुछ चुकाना है..सजन रे झूठ मत बोलो...
शैलेन्द्र का लिखा ये गीत बड़ा फेमस है और मेरा सबसे पसंदीदा भी...पर जाने क्यों मुझे अच्छा नहीं लग रहा है अब....