Sunday, 8 August 2021

जीवन के दिन

अपना सबकुछ
दांव पर लगा 
जीत और हार के बीच
झूलते हुए व्यक्ति से पूछो
कितने युग होते हैं
एक क्षण में

पूछो
किसी डरे हुए व्यक्ति से
कितनी लम्बी होती है
डर की उम्र


पूछो किसी स्वजन के
खो जाने का दुख
कितना लम्बा होता है


उम्र की ये डोर कभी कभी
सदियों से भी लम्बी लगती है

जीवन के दिन
बस कहने को चार हैं

Thursday, 10 June 2021

रघुपति सहाय

मेरा एक जीवन है
उसमें मेरे प्रिय हैं, मेरे हितैषी हैं, मेरे गुरुजन हैं
उसमें कोई मेरा अनन्यतम भी है

पर मेरा एक और जीवन है
जिसमें मैं अकेला हूँ
जिस नगर के गलियारों, फुटपाथ, मैदानों में घूमा हूँ
हँसा खेला हूँ
उसके अनेक हैं नागर, सेठ, म्युनिस्पलम कमिश्नर, नेता
और सैलानी, शतरंजबाज और आवारे
पर मैं इस हाहाहूती नगरी में अकेला हूँ।

देह पर जो लता सी लिपटी
आँखों में जिसनें कामना से निहारा
दुख में जो साथ आये
अपने वक्त पर जिन्होंने पुकारा
जिनके विश्वास पर वचन दिये, पालन किया
जिनका अंतरंग हो कर उनके किसी भी क्षण में मैं जिया

वे सब सुहृद है, सर्वत्र हैं, सर्वदा हैं
पर मैं अकेला हूँ।

सारे संसार में फैल जायेगा एक दिन मेरा संसार
सभी मुझे करेंगे-दो चार को छोड़-कभी न कभी प्यार
मेरे सृजन, कर्म-कर्तव्य, मेरे आश्वासन, मेरी स्थापनायें
और मेरे उपार्जन, दान-व्यय, मेरे उधार
एक दिन मेरे जीवन को छा लेंगे- ये मेरे महत्व। 
डूब जायेगा तंत्रीनाद कवित्त रस में, राग में रंग में
मेरा यह ममत्व
जिससे मैं जीवित हूँ।
मुझ परितप्त को तब आ कर वरेगी मृत्यु - मैं प्रतिकृत हूँ।

पर मैं फिर भी जियुँगा
इसी नगरी में रहूँगा
रूखी रोटी खाउँगा और ठंड़ा पानी पियूँगा
क्योंकि मेरा एक और जीवन है और उसमें मैं अकेला हूँ।

Sunday, 14 March 2021

कुँवर नारायण

कितना स्पष्ट होता आगे बढ़ते जाने का मतलब
अगर दसों दिशाएँ हमारे सामने होतीं
हमारे चारो ओर नहीं।
कितना आसान होता चलते चले जाना
यदि केवल हम चलते होते
बाक़ी सब रुका होता।

मैंने अक्सर इस ऊल-जुलूल दुनिया को
दस सिरों से सोचने और बीस हाथों से पाने की कोशिश में
अपने लिए बेहद मुश्किल बना लिया है।

शुरू-शुरू में सब यही चाहते हैं
कि सब कुछ शुरू से शुरू हो,
लेकिन अंत तक पहुँचते पहुँचते हिम्मत हार जाते हैं
हमें कोई दिलचस्पी नहीं रहती
कि वह सब कैसे समाप्त होता है
जो इतनी धूमधाम से शुरू हुआ था
हमारे चाहने पर।

दुर्गम वनों और ऊँचे पर्वतों को जीतते हुए
जब तुम अंतिम ऊँचाई को भी जीत लोगे –
तब तुम्हें लगेगा कि कोई अंतर नहीं बचा अब
तुममें और उन पत्थरों की कठोरता में
जिन्हें तुमने जीता है –
जब तुम अपने मस्तक पर बर्फ का पहला तूफ़ान झेलोगे
और कांपोगे नहीं –
तब तुम पाओगे कि कोई फर्क़ नहीं
सब कुछ जीत लेने में
और अंत तक हिम्मत न हारने में। 

कुँवर नारायण