खूब घने पेड़ हैं आंगन में , नीम ,आंवला ,पीपल ,आम सब तो हैं ! छुटकी भी है एक , मां उधर धान फैलाती हैं और वो नन्हीं मुट्ठियों में भर पेड़ के नीचे बिखेर देती है उस चहचाहट के लिए जो आंगन को भरे रखती है | उससे उन गौरियाओं की इतनी पक्की दोस्ती है कि धान बिखेरते हुए उसी के कंधों पर आ बैठती हैं ! वो प्यार से झिड़कती ,बतियाती अपने खेल में मशगूल रहती है। माँ को बड़ी मम्मी कहती है। अपनी मां को उनके नाम से बुलाती है ,घर भर को सिर पर उठाये रहना उसका शगल है। कहती है शाम हो रही है इसको रोक लो ना , जिद ठान ली ! पूछा क्यों तो जवाब दिया कि इसके बाद रात आ जाएगी और फिर सुबह , फिर सुबह स्कूल जाना पड़ेगा ना................. कितना सब है इस आंगन में !
बाऊजी से मिलने आया था , एक्सीडेंट हो गया और तब से अस्पताल ,खेतों और ट्रेन के फेरे लगा रहा हूँ।जिंदगी किसी कथा -कहानी सी लगने लगी है , कोई एपीसोड उम्मीदों से भरा और कोई रेत सा फिसला लगता है। सब कुछ होने और कुछ भी न होने के बीच की परिभाषा ही तय नहीं कर पा रहा हूँ ,ना देख पा रहा हूँ कि जिंदगी किस दिशा में लिए जा रही है। एक पल के लिए लगता है कि सब कुछ हाथ से छूटता जा रहा है। पढ़ना चाहता था कि घर -परिवार और बाउजी के एक्सीडेंट ने उन जिम्मेदारियों को भी मेरे हिस्से कर दिया।
सब कुछ करते हुए भी कुछ ना कर पाने की गिल्ट घेर लेती है कभी और कभी इतने सुकून में होता हूँ कि जिंदगी गाँव किनारे पगडंडी पर लगी पेड़ों के झुरमुट सी लगती है जिस पर हजार खुशियाँ ,उम्मीदें चहचहा रही हैं और दिल उसी छाँव में पसरा है।
अब ये रोज की बात हो गयी है किसी के घर कोई बीमार हो तो मैं , किसी के बैंक का काम हो तो मैं और किसी के बच्चों को गाँव के मास्टरों को गलत पढ़ाते देख सही कराना हो तो मैं.......... ये उलझन मुझे रास आती है पर सवाल भी दे जाती है कि कब तक ?
कंक्रीट के उस जंगल में सब है बस रिश्ते नहीं हैं , यहाँ सब है पर रिश्तों की अपेक्षाओं और खुद की उपेक्षा की अमरबेल है जो गाहे बेगाहे मेरे इर्दगिर्द उग आती है।
क्या मैं गाँव हो गया हूँ या गाँव मुझसे छूट गया है और मैं शहर के किसी जाम में फंसा कोई अर्धशहरी हूँ ?
4 comments:
ज़िन्दगी की सर्कस के बीच गुलाटियां खाती रोज़मर्रा की कश्मकश.. शहर के जाम में फंसे अर्धशहरी तो नहीं कह सकता, हाँ गाँव के आँगन में खड़े नीम की छाँव में छूटी उमर की एक छाया हम सब ज़रूर हैं।
Bas sukoon ko roke rahiye!! Achha likha hai...
उत्तम अभिव्यक्ति
जरूर मोनिका मैम :) शुक्रिया !
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