मैं सच में धान की इन बालियों के इश्क में हूँ और केवल इन्हीं के नहीं बल्कि तमाम उन झूलती – बहकती अमियाँ की , कनखियों से देखती पीपल की चिकनी पत्तियों के भी इश्क में हूँ |
उनके बीच होता हूँ तो जिन्दगी आशिकी के उस तिलिस्मी संसार में ले जाती है, जहाँ बस मैं हूँ और मेरे आसपास उनकी नर्म छुअन ! अपने खेतों की मेढ़ों पर कितने भी करीने से कदम रखूं ,जाने कहाँ से कब उन की और फिसलता हूँ और उठता हूँ तो बदन पर उनकी गंध रह जाती है |
कितनी ही बार खेत किनारे लगे नीम के पेड़ के सहारे लगे हुए मैंने इन सबके बीच अपने को खुद से उलझते ,कभी खुद को पाते देखा है | किसी सुबह जब जमीन से फूटती उम्मीदें दिखाई पड़ती हैं तो उसी पल सपनों की फसल सच हुई लगने लगती है और किसी सुबह उनके ऊपर पडी ओस की बूदें उन सपनों से झिंझोड़ के जगा देती हैं ।
अपने खेतों –फसलों और आसपास रोपाई –कटाई करती औरतों के गीतों में मुझे गजब की लज्जत नजर आती है | देसी प्रेम है मेरा , खांटी देसी आशिकी करता हूँ |
भीगता हूँ इन बालियों के साथ और कभी भैंसों के बहाने उनको निहारते हुए खेत पार के मन्दिर तक चला जाता हूँ | यार दोस्त सब वहीं चौपाल लगाते हैं , सबकी अपनी अपनी दुनिया है पर सबकी आशिकी साझा है |
आज मन्दिर जाना था , जोया हुई है ना ! जोया हमारी नन्ही मेहमान है , अब तीन से चार भैंस बंधी हैं आंगन में .... उसके दूध को उबाल कर मन्दिर में चढाया गया और अब वो गाँव भर पी सकेगा | गीत सुन रहा था वहां ....... सोच रहा था , उत्सव के ऐसे मौके तो इश्क में ही आते हैं | मन कुछ भी नहीं छोड़ना चाहता |
गाँव सच में ऐसा ही है , धान की बालियों की सरसराहट भी वैसी ही है जैसी मैं उसके आँचल में महसूस करता हूँ | मैं इश्क में हूँ , खांटी आशिकी कर रहा हूँ नीम तले , जुगनुओं के बीच , उसको गुनगुना रहा हूँ ,जिसने मुझे इश्क में गाँव कर दिया है |
Wednesday, 27 September 2017
मैं सच में धान की बालियों संग इश्क़ में हूँ ..
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1 comment:
अरे वाह इतना खूबसूरत कि गाँव जाने को मन कर गया और इश्क़ भी:)
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