Saturday, 6 May 2017

शिकायतें खुद से कम कीजिये क्यूंकि जिससे इश्क में होते हैं उससे नाराज़ नहीं होते .....

उससे अक्सर बात होती है और हर बार मानो खुद से बात होती है ! वो जो कुछ कहता है ,मुझमें ही घटा लगता है ! आज भी कुछ ऐसा ही हुआ ......

" कितनी ही बार ऐसा होता है कि सब समेट के चलने लगते हैं और दो कदम भी नहीं पहुंचते कि सब कुछ फिर से बिखर जाता है | सुनो , सामान को समेटना आसान होता है लेकिन उस हौसले को हर बार समेटना मुश्किल होता है जो बमुश्किल ,हजार मिन्नतों के बाद दामन में ठहरा हो........ " वो कहता जा रहा था  |

" हजार ऐसे सवाल और हज़ार उनके जवाब हैं जो दे सकता हूँ पर खुद को बहला नहीं सकता कि वो सवाल गलत हैं या मेरे जवाब  !! जब दोनों ही सही हैं तो फिर गलत भी कुछ नहीं ,और जब गलत नहीं तो फिर इस सवाल -जवाब से हासिल भी कुछ नहीं ............".

" कोई समझता नहीं मुझको , सबको सिर्फ अपेक्षाएं हैं मुझसे ! मैं भी तो कुछ अपेक्षा रखता हूँ ,कौन पूछता है ? सबको अपनी फ़िक्र है ,सबकी अपनी दुनिया है ...... मैं नौकरी करता था तो दिन से वाबस्ता नहीं था ! उन लोगों से भी नहीं ,हाँ ..घरवालों  से भी यदाकदा बात करता था ! सबकी जरूरतें पूरी होती रहें ,मैं उनकी ख़ुशी में शामिल हूं या नहीं हूं......किसको फ़िक्र है ? "

मैं सुन रहा था  ! कई बार सुना और हर बार महसूस किया कि हम सब कितने असुरक्षित हैं जो ना उन रिश्तों से दूर जा पाते हैं और ना उनके साथ खुद को खुश रख पाते हैं जो हमारे कंधों पर हमारी ही इच्छा से सवार हैं और हमारे पैरों को ही कमजोर कर रहे हैं |

वो एक दिन कहने लगा "नौकरी के लिए घर परिवार से दूर रहना एक मजबूरी है लेकिन उस दूरी के साथ जो दूरी रिश्तों में चली आती है उसको कैसे पार किया जा सकता है | कई बार जब दिन की शिफ्ट में फीमेल कलीग को और रात में उसके हस्बैंड को ड्यूटी पर देखता हूँ तो लगता है कि ये कैसा रिश्ता है ? "

मैं क्या जवाब देता ? हाँ.......बच्चों और परिवार की जरूरतों के बीच के ये आर्थिक समीकरण रिश्तों की इक्वेशन को बिगाड़ देते हैं | उसको लगता है कि वो इसका हिस्सा बनता जा रहा है तो घबरा जाता है |

"आर्थिक जरूरतें समझौतों की हदें पार कर देती हैं | मन हो या न हो फिर भी मुस्कुराते हुए मिलना भी किसी नौटंकी सा  लगता है ! मैं थक गया हूँ इस सबसे ....... " वो झुंझला उठा !

"दोस्त आया था कहने लगा बात तलाक तक आ पहुंची है ! मैं हैरान था कि दोनों चार साल से एक दूसरे को जानते हैं और अब दो महीने शादी को नहीं हुए और बात इतनी बिगड़ गयी .......... ?"

वो एक पल में इस सबसे दूर चला जाना चाहता है और दूसरे ही पल अपनी नन्हीं भतीजी के खिलौने की फरमाइश और बहिन के भविष्य को लेकर चिंता करने लगता है |

उससे बात करते हुए महसूस कर रहा था कि उसकी बातें उस पूरी पीढ़ी के मन का आईना है जो पूरी तरह से ना संस्कारों को निभा पा रही है ना उनसे दूर ही जाना चाहती है | ऐसे टूटे हुए ,अधूरे मन से की गयी यात्राएं किस को , कौनसी मंजिल तक ले जाएंगी नहीं पता लेकिन ये जरूर दिख रहा है कि उनके -हमारे आसपास एक ऐसी छद्म दुनिया उग आयी है जो उन्हें ठग रही है |

उसके साथ बात करते हुए मैंने मेरी ही बात पर मुहर लगा ली कि वक्त कैसा भी हो ..... कभी वैसा नहीं होता जैसा हम चाहते हैं | वो वैसा होता है जैसा होता है और वैसा होने के लिए हम सब को भी मजबूर कर देता है |

आज वो किसी और ही मनः स्थिति में था और ये सब कह रहा था पर मुझे पता है अगली बार फिर जब उससे बात होगी तो वो फिर अपनी किसी उपलब्धि पर इतराता मिलेगा और उसी ऊर्जा के साथ सीढ़ीयां चढ़ता सबसे बतियाता और बहस में उलझा मिलेगा !

दोस्त ! हम सब ऐसे ही हैं , हम सब में कितने किरदार हैं ,हम सब में कितनी ही कहानियां हैं  ...........   ये सफर बेहद दिलचस्प है और इसका अंत उम्मीद से ज्यादा नाटकीय होता है !

मैं भी इसी मोहिनी दुनिया में जी रहा हूँ  आप भी जी लीजिये इसे जी भर के , शिकायतें खुद से कम कीजिये क्यूंकि जिससे इश्क में होते हैं उससे नाराज़ नहीं होते .....