वो कहती है मुझे इश्क नहीँ तुमसे…
हाँ पर मेरे हर ख़याल में तुम होते हो
हर फूल में तुमको देखती हूँ
जब हवाएं छूकर गुजरती हैं
तो ऐसा लगता है
जैसे मुझे छूकर गुजरे हो तुम….
ज़ुल्फो में अटकी बूँदें जो कभी अठखेलियाँ करती हैं..
तो उनमें भी तुम्हारी उँगलियों की जुम्बिश महसूस करती हूँ और तुम्हारे स्पर्श के
ये मोती कहीँ गिरकर बिखर ना जाएँ…इसलिये उनको अपने हथेलियों में लेकर तुम्हारे छुअन से उपजी गुदगुदी को महसूस करती हूँ..
शानों से लहराते मेरे आँचल ..तुम्हारी ही कोई शरारत लगती हैं..
कभी रात जब बहुत गहरी मालूम होती है ..तो उन गहरे अँधेरों में जल रहे दिये की लौ में तुमको पाती हूँ
जब रात के बाद सूरज निकलता है… तो सूरज की उन पहली सुनहरी किरणो की लालिमा में तुम्हारा अक्स नज़र आता है…
दोपहर की जलती हुई धूप में पेड़ के छाये भी तुम्हारे साये की तरह लगते हैं..
शाम जब भी उदास होती है …अपनी नज्मों में तुमको गुनगुनाती हूँ मैं..और शाम गुलज़ार हो जातीं है…
अब मैं इबादत नहीं करती
मैं भूल गई हूं इबादत करना और अब तुम्हारा नाम लेती हूँ…
भूल गई हूँ सबकुछ….बस एक तुम हो…जो मुझे याद रह गये हो…
पर जब भी उससे कहता हूँ की ये इश्क नहीं तो क्या है ?
तो कहती है वो..मुझे अब इश्क नही तुमसे
अब मैं तुम्हारी इबादत करती हूँ…किसी खुदा कि तरह…
जो कभी किसी को नहीँ मिलता…..
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