Sunday, 8 January 2017

गिरवी रखे कुछ सामान...

बेफ़िक्री के वो दिन 
कुछ रात ख्यालों वाली 

आँखों की वो पहली नींद
उस नींद में देखे पहले ख्वाब

भावनाओं में डूबे

वो हसीन पल..

तुम्हारे जूड़े के फेरों से लिपटे हुए 
उस फूल की कुछ पंखुड़ियां 
जो सूख गईं हैं अब
किताब के किसी पन्नों तले

तुम्हारी लटों को घुमावदार बनाते 
मेरी उँगलियों के वो स्पर्श 

कभी निराशा के दिनों में 
तुमसे लिपट के रोते हुए 
तुम्हारे सीने में उतारी हुई 
मेरी कुछ उदासियाँ…

हम एक दूसरे को 
वापस नहीं कर सके 

ये एक अमानत है
जो हमने 
अपने प्रेम को
अपने साथ बनाए रखने की चाह में 
एक दूसरे के पास 
गिरवी रख दिया था…

पर ...
वो प्रेम खो गया कहीं 
उन रिवाज़ों के जंगल से गुजरते वक़्त..

तुमसे भी और मुझसे भी। 

अब वो गिरवी रखे कुछ सामान 
हम एक दूसरे से छुड़ा नहीं पाएंगे कभी

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