Sunday, 8 January 2017

छूट गया बहुत कुछ...

गाँव छोड़ते हुए
छूट गया गाँव में
बहुत कुछ

छूट गये..

साँझ ढ़ले
पेड़ों में समाते
तोतों के झुंड

चिड़ियों का शोर

क्षितिज की लाली

बाँसों के झुरमुट में टँगा चाँद
चाँद से बतियाती
कोई जंगली बेल

झिँगुरो के
पायल छनकाते से बोल

पीपल के पेड़ पे टिमटिमाते जुगनुओ का बसेरा..

छूट गईं
दरवाजे से लगी दो आँखे
जो हर वक़्त इंतजार में डूबी रहती थी

छूट गये
सोंधी मिट्टी के दालान

गाती हुई ऋतुएँ….

छूट गया एक आँचल..
जो दुलार से
कभी माथे का पसीना
तो कभी तकलीफ में बहे अश्रुओं को सुखाया करते थे

छूट गये वो हाथ..
जो कभी गिरने पर
हथेलियों की थपकी से…फ़िर से दुर तक जाने का हौसला दिया करते थे..

छूटने छोड़ने के बीच
जो साथ आया वो मेरा नहीँ था..

साथ आये कुछ सपने..
जिसे किसी और ने मेरे लिये देखे थे…

साथ में आई कुछ उम्मीदें..
जो घर से निकलते वक़्त किसी ने मेरी कलाइयों में टाँक दिया..

साथ चली आई कुछ स्मृतियां उन चेहरों की…जिनपर वक़्त ने झुर्रियों के निशान डालने शुरू कर दिये थे..

साथ आई
कुछ पीड़ा..सबकुछ छूट जाने की…
जो आज भी कभी कभी मन में टीसती है रह रह कर…

मनचाही चीजों को छोड़ अनचाहे को पाने के क्रम में..कब गाँव की पगडंडियों से चलते शहर की चौड़ी सड़को पे आया पता नहीँ चला..

पर इन पांवों में अब वो अल्हड़पन नहीँ जो खेतों के बीच दौड़ते वक़्त हुआ करती थी..

अब बड़ी संजीदगी से धरता हूँ पाँव…बहुत दूर तक जाती हुई इन कंक्रीट की सड़कों पर…

ताकि जख्मी ना हो जाएँ उन सपनों के पाँव जो किसी ने मेरे लिये देखे हैं..
कहीँ गिरकर टूट ना जाएँ वो उम्मीदें…जो किसी ने बड़ी उम्मीद से मेरी कलाइयों पे टाँके हैं…

अब….

जाना है दूर तक उन सपनों के लिये…जागना है देर तक उन उम्मीदों पे खरा उतरने के लिये…

जो मेरे नहीँ हैं

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