तुमको सूरज कहूँ ?
जो झांकती हो मेरी आँखों में
इतनी रौशनी लिये हर सुबह
या कहूँ सर्दियों के वो सुनहरे धूप वाले दिन
जिनके साए में पड़े रहना अच्छा लगता है
तुमको शाम कहूँ क्या?
जो लेकर आती हो इतने सारे रंग अपने साथ
या फिर कहूँ रात?
जिसके आँचल में टिमटिमाते हैं तारे
और चमकता है चाँद माथे पर
किसी बिंदी जैसा...
जब होता है मन
कुछ पढ़ने का
तो तुम बन जाती हो किताब
जो लिखने बैठूं
तो तैरती हो ज़ेहन में
खूबसूरत खयाल बनकर
मिलती हो तुम मुझे
शोर में किसी गहरी चुप्पी सी
होती हो मेरे शांत से कमरे में,किसी सुरमई धुन पे थिरकती सी
दिन-रात
सुबह-शाम
हर वक़्त
हर ओर
हर रूप में,तुम ही होती हो
तुमको कायनात कहूँ क्या?
No comments:
Post a Comment